महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1942, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंकर्ण भी अपने पैने बाणोंसे विशाल पाण्डवसेनाको हताहत करके बड़े-बड़े रथियोंको धूलमें मिलाकर युधिष्ठिरको पीड़ा देने लगा ।। २१ १/२ ।।
विवस्त्रायुधदेहासून् कृत्वा शत्रून् सहस्रशः ।। २२ ।।
युक्त्वा स्वर्गयशोभ्यां च स्वेभ्यो मुदमुदावहत् ।
वह सहस्रों शत्रुओंको वस्त्र, आयुध शरीर और प्राणोंसे शून्य करके उन्हें स्वर्ग और सुयशसे संयुक्त करता हुआ आत्मीयजनोंको आनन्द प्रदान करने लगा ।।
एवं मारिष संग्रामो नरवाजिगजक्षयः ।
कुरूणां सृञ्जयानां च देवासुरसमोऽभवत् ।। २३ ।।
मान्यवर! इस प्रकार मनुष्यों, घोड़ों और हाथियोंका विनाश करनेवाला वह कौरवों तथा सृंजयोंका युद्ध देवासुर-संग्रामके समान भयंकर था ।। २३ ।।
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संकुलयुद्धे सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ।। ४७ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें संकुलयुद्धविषयक सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४७ ।।