महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1943, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टचत्वारिंशोऽध्यायः
कर्णके द्वारा बहुत-से योद्धाओंसहित पाण्डव-सेनाका संहार, भीमसेनके द्वारा कर्णपुत्र भानुसेनका वध, नकुल और सात्यकिके साथ वृषसेनका युद्ध तथा कर्णका राजा युधिष्ठिरपर आक्रमण
धृतराष्ट्र उवाच
यत्तत् प्रविश्य पार्थानां सैन्यं कुर्वञ्जनक्षयम् । कर्णो राजानमभ्येत्य तन्ममाचक्ष्व संजय ॥ १ ॥ **धृतराष्ट्रने पूछा—**संजय! कर्ण कुन्तीपुत्रोंकी सेनामें प्रवेश करके राजा युधिष्ठिरके पास पहुँचकर जो जनसंहार कर रहा था, उसका समाचार मुझे सुनाओ ॥ १ ॥ के च प्रवीराः पार्थानां युधि कर्णमवारयन् । कांश्च प्रमथ्याधिरथिर्युधिष्ठिरमपीडयत् ॥ २ ॥ उस समय पाण्डवपक्षके किन-किन प्रमुख वीरोंने युद्धस्थलमें कर्णको आगे बढ़नेसे रोका और किन-किनको रौंदकर सूतपुत्र कर्णने युधिष्ठिरको पीड़ित किया ॥ २ ॥
संजय उवाच
धृष्टद्युम्नमुखान् पार्थान् दृष्ट्वा कर्णो व्यवस्थितान् । समभ्यधावत्त्वरितः पञ्चालान् शत्रुकर्षणः ॥ ३ ॥ **संजयने कहा—**राजन्! कर्णने धृष्टद्युम्न आदि पाण्डववीरोंको खड़ा देख बड़ी उतावलीके साथ शत्रुसंहारकारी पांचालोंपर धावा किया ॥ ३ ॥ तं तूर्णमभिधावन्तं पञ्चाला जितकाशिनः । प्रत्युद्ययुर्महात्मानं हंसा इव महार्णवम् ॥ ४ ॥ विजयसे उल्लसित होनेवाले पांचाल वीर शीघ्रतापूर्वक आक्रमण करते हुए महामना कर्णकी अगवानीके लिये उसी प्रकार आगे बढ़े, जैसे हंस महासागरकी ओर बढ़ते हैं ॥ ४ ॥ ततः शङ्खसहस्राणां निःस्वनो हृदयङ्गमः । प्रादुरासीदुभयतो भेरीशब्दश्च दारुणः ॥ ५ ॥ तदनन्तर दोनों सेनाओंमें सहसा सहस्रों शंखोंकी ध्वनि प्रकट हुई, जो हृदयको कम्पित कर देती थी। साथ ही भयंकर भेरीनाद भी होने लगा ॥ ५ ॥ नानाबाणनिपाताश्च द्विपाश्वरथनिःस्वनः ।