भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1944, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 1944

सिंहनादश्च वीराणामभवद् दारुणस्तदा ॥ ६ ॥
उस समय नाना प्रकारके बाणोंके गिरने, हाथियोंके चिग्घाड़ने, घोड़ोंके हींसने, रथके घरघराने तथा वीरोंके सिंहनाद करनेका दारुण शब्द वहाँ गूँज उठा ॥ ६ ॥

साद्रिद्रुमार्णवा भूमिः सवाताम्बुदमम्बरम् ।
सार्केन्दुग्रहनक्षत्रा द्यौश्च व्यक्तं विघूर्णिता ॥ ७ ॥
पर्वत, वृक्ष और समुद्रोंसहित पृथ्वी, वायु तथा मेघोंसहित आकाश एवं सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह और नक्षत्रोंसहित स्वर्ग स्पष्ट ही घूमते-से जान पड़े ॥ ७ ॥

इति भूतानि तं शब्दं मेनिरे ते च विव्यथुः ।
यानि चाप्यल्पसत्त्वानि प्रायस्तानि मृतानि च ॥ ८ ॥
इस प्रकार समस्त प्राणियोंने उस तुमुल नादको सुना और सब-के-सब व्यथित हो उठे। उनमें जो दुर्बल प्राणी थे, वे प्रायः मर गये ॥ ८ ॥

अथ कर्णो भृशं क्रुद्धः शीघ्रमस्त्रमुदीरयन् ।
जघान पाण्डवीं सेनामासुरीं मघवानिव ॥ ९ ॥
तत्पश्चात् जैसे इन्द्र असुरोंकी सेनाका विनाश करते हैं, उसी प्रकार अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए कर्णने शीघ्रतापूर्वक अस्त्र चलाकर पाण्डव-सेनाका संहार आरम्भ किया ॥ ९ ॥

स पाण्डवबलं कर्णः प्रविश्य विसृजञ्छरान् ।
प्रभद्रकाणां प्रवरानहनत् सप्तसप्ततिम् ॥ १० ॥
पाण्डवोंकी सेनामें प्रवेश करके बाणोंकी वर्षा करते हुए कर्णने प्रभद्रकोंके सतहत्तर प्रमुख वीरोंको मार डाला ॥ १० ॥

ततः सुपुङ्खैर्निशितै रथश्रेष्ठो रथेष्षुभिः ।
अवधीत् पञ्चविंशत्या पञ्चालान् पञ्चविंशतिम् ॥ ११ ॥
तदनन्तर रथियोंमें श्रेष्ठ कर्णने सुन्दर पंखवाले पचीस पैने बाणोंद्वारा पचीस पांचालोंको कालके गालमें भेज दिया ॥ ११ ॥

सुवर्णपुङ्खैर्नाराचैः परकायविदारणैः ।
चेदिकानवधीद् वीरः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ १२ ॥
वीर कर्णने शत्रुओंके शरीरको विदीर्ण कर देनेवाले सुवर्णमय पंखयुक्त नाराचोंद्वारा सैकड़ों और हजारों चेदिदेशीय वीरोंका वध कर डाला ॥ १२ ॥

तं तथा समरे कर्म कुर्वाणमतिमानुषम् ।
परिवव्रुर्महाराज पञ्चालानां रथव्रजाः ॥ १३ ॥
महाराज! इस प्रकार समरांगणमें अलौकिक कर्म करनेवाले कर्णको पांचाल रथियोंने चारों ओरसे घेर लिया ॥

ततः संधाय विशिखान् पञ्च भारत दुःसहान् ।
पञ्चालानवधीत् पञ्च कर्णो वैकर्तनो वृषः ॥ १४ ॥

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