भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1961, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 1961

ततो बाह्वोर्ललाटे च हृदि चैव युधिष्ठिरः । चतुर्भिस्तोमरैः कर्णं ताडयित्वानदन्मुदा ॥ ४६ ॥ तत्पश्चात् युधिष्ठिरने कर्णकी दोनों भुजाओं, ललाट और छातीमें चार तोमरोंका प्रहार करके सानन्द सिंहनाद किया ॥ ४६ ॥ उद्भिन््नरुधिरः कर्णः क्रुद्धः सर्प इव श्वसन् । ध्वजं चिच्छेद भल्लेन त्रिभिर्विव्याध पाण्डवम् ॥ ४७ ॥ इषुधी चास्य चिच्छेद रथं च तिलशोऽच्छिनत् । कर्णके शरीरसे रक्त बहने लगा। फिर तो क्रोधमें भरे हुए सर्पके समान फुफकारते हुए कर्णने एक भल्लसे युधिष्ठिरकी ध्वजा काट डाली और तीन बाणोंसे उन पाण्डुपुत्रको भी घायल कर दिया। उनके दोनों तरकस काट दिये और रथके भी तिल-तिल करके टुकड़े-टुकड़े कर डाले ॥ ४७ १/२ ॥ (एतस्मिन्नन्तरे शूराः पाण्डवानां महारथाः । ववृषुः शरवर्षाणि राधेयं प्रति भारत ॥ भारत! इसी बीचमें शूरवीर पाण्डव महारथी राधापुत्र कर्णपर बाणोंकी वर्षा करने लगे। सात्यकिः पञ्चविंशत्या शिखण्डी नवभिः शरैः । अवर्षतां महाराज राधेयं शत्रुकर्शनम् ॥ महाराज! सात्यकिने शत्रुसूदन राधापुत्रपर पचीस और शिखण्डीने नौ बाणोंकी वर्षा की। शैनेयं तु ततः क्रुद्धः कर्णः पञ्चभिरायसैः । विव्याध समरे राजंस्त्रिभिश्चान्यैः शिलीमुखैः ॥ राजन्! तब क्रोधमें भरे हुए कर्णने समरांगणमें सात्यकिको पहले लोहेके बने हुए पाँच बाणोंसे घायल करके फिर दूसरे तीन बाणोंद्वारा उन्हें बींध डाला। दक्षिणं तु भुजं तस्य त्रिभिः कर्णोऽप्यविध्यत । सव्यं षोडशभिर्बाणैर्यन्तारं चास्य सप्तभिः ॥ इसके बाद कर्णने सात्यकिकी दाहिनी भुजाको तीन, बायीं भुजाको सोलह और सारथिको सात बाणोंसे क्षत-विक्षत कर दिया। अथास्य चतुरो वाहांश्चतुर्भिर्निशितैः शरैः । सूतपुत्रोऽनयत् क्षिप्रं यमस्य सदनं प्रति ॥ तदनन्तर चार पैने बाणोंसे सूतपुत्रने सात्यकिके चारों घोड़ोंको भी तुरंत ही यमलोक पहुँचा दिया। अपरेणाथ भल्लेन धनुश्छित्त्वा महारथः । सारथेः सशिरस्त्राणं शिरः कायादपाहरत् ॥

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