भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1962

फिर दूसरे भल्लसे महारथी कर्णने उनका धनुष काटकर उनके सारथिके

शिरस्त्राणसहित मस्तकको शरीरसे अलग कर दिया।

हताश्वसूते तु रथे स्थितः स शिनिपुङ्गवः ।

शक्तिं चिक्षेप कर्णाय वैडूर्यमणिभूषिताम् ॥

जिसके घोड़े और सारथि मारे गये थे, उसी रथपर खड़े हुए शिनिप्रवर सात्यकिने

कर्णके ऊपर वैदूर्यमणिसे विभूषित शक्ति चलायी।

तामापतन्तीं सहसा द्विधा चिच्छेद भारत ।

कर्णो वै धन्विनां श्रेष्ठस्तांश्च सर्वानवारयत् ॥

ततस्तान् निशितैर्बाणैः पाण्डवानां महारथान् ।

न्यवारयदमेयात्मा शिक्षया च बलेन च ॥

भारत! धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ कर्णने अपने ऊपर आती हुई उस शक्तिके सहसा दो टुकड़े कर

डाले और उन सब महारथियोंको आगे बढ़नेसे रोक दिया, फिर अमेय आत्मबलसे सम्पन्न

कर्णने अपनी शिक्षा और बलके प्रभावसे तीखे बाणोंद्वारा उन सभी पाण्डव-महारथियोंकी

गति अवरुद्ध कर दी।

अर्दयित्वा शरैस्तांस्तु सिंहः क्षुद्रमृगानिव ।

पीडयन् धर्मराजानं शरैः संनतपर्वभिः ॥

अभ्यद्रवत राधेयो धर्मपुत्रं शितैः शरैः ।)

जैसे सिंह छोटे मृगोंको पीड़ा देता है, उसी प्रकार राधापुत्र कर्णने उन महारथियोंको

बाणोंसे पीड़ित करके झुकी हुई गाँठवाले तीखे बाणोंसे चोट पहुँचाते हुए वहाँ धर्मराज

धर्मपुत्र युधिष्ठिरपर पुनः आक्रमण किया।

कालवालास्तु ये पार्थ दन्तवर्णावहन् हयाः ।। ४८ ।।

तैर्युक्तं रथमास्थाय प्रायाद् राजा पराङ्मुखः ।

उस समय दाँतोंके समान सफेद रंग और काली पूँछवाले जो घोड़े युधिष्ठिरकी सवारीमें

थे, उन्हींसे जुते हुए दूसरे रथपर बैठकर राजा युधिष्ठिर रणभूमिसे विमुख हो शिविरकी ओर

चल दिये ।। ४८ १/२ ।।

एवं पार्थोऽभ्यपायात् स निहतः पार्ष्णिसारथिः ।। ४९ ।।

अशक्नुवन् प्रमुखतः स्थातुं कर्णस्य दुर्मनाः ।

युधिष्ठिरका पृष्ठरक्षक पहले ही मार दिया गया था। उनका मन बहुत दुःखी था,

इसलिये वे कर्णके सामने ठहर न सके और युद्धस्थलसे हट गये ।। ४९ १/२ ।।

अभिद्रुत्य तु राधेयः पाण्डुपुत्रं युधिष्ठिरम् ।। ५० ।।

वज्रच्छत्रांकुशैर्मत्स्यैर्ध्वजकूर्माम्बुजादिभिः ।

लक्षणैरुपपन्नेन पाण्डुना पाण्डुनन्दनम् ।। ५१ ।।

पवित्रीकर्तुमात्मानं स्कन्धे संस्पृश्य पाणिना ।