भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1964

न्यहनत् पाण्डवीं सेनां वज्रहस्त इवासुरीम् । महाबली कर्णने युधिष्ठिरसे ऐसा कहकर फिर उन्हें छोड़ दिया और जैसे वज्रधारी इन्द्र असुरसेनाका संहार करते हैं, उसी प्रकार पाण्डव-सेनाका विनाश आरम्भ कर दिया ।। ५९ १/२ ।।

ततोऽपायाद् द्रुतं राजन् व्रीडन्निव नरेश्वरः ।। ६० ।। अथापयातं राजानं मत्वान्वीयूस्तमच्युतम् । चेदिपाण्डवपाञ्चालाः सात्यकिश्च महारथः ।। ६१ ।। द्रौपदेयास्तथा शूरा माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ । राजन्! तब राजा युधिष्ठिर लजाते हुए-से तुरंत रणभूमिसे भाग गये। राजाको रणक्षेत्रसे हटा हुआ जानकर चेदि, पाण्डव और पांचाल वीर, महारथी सात्यकि, द्रौपदीके शूरवीर पुत्र तथा पाण्डुनन्दन माद्रीकुमार नकुल-सहदेव भी धर्म-मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले युधिष्ठिरके पीछे-पीछे चल दिये ।। ६०-६१ १/२ ।।

ततो युधिष्ठिरानीकं दृष्ट्वा कर्णः पराङ्मुखम् ।। ६२ ।। कुरुभिः सहितो वीरः प्रहृष्टः पृष्ठतोऽन्वगात् । तदनन्तर युधिष्ठिरकी सेनाको युद्धसे विमुख हुई देख हर्षमें भरे हुए वीर कर्णने कौरव-सैनिकोंको साथ लेकर कुछ दूरतक उसका पीछा किया ।। ६२ १/२ ।।

भेरीशङ्खमृदङ्गानां कार्मुकाणां च निःस्वनः ।। ६३ ।। बभूव धार्तराष्ट्राणां सिंहनादरवस्तथा । उस समय भेरी, शंख, मृदंग और धनुषोंकी ध्वनि सब ओर फैल रही थी तथा दुर्योधनके सैनिक सिंहके समान दहाड़ रहे थे ।। ६३ १/२ ।।

युधिष्ठिरस्तु कौरव्य रथमारुह्य सत्वरम् ।। ६४ ।। श्रुतकीर्तेर्महाराज दृष्टवान् कर्णविक्रमम् । कुरुवंशी महाराज! युधिष्ठिरके घोड़े थक गये थे; अतः उन्होंने तुरंत ही श्रुतकीर्तिके रथपर आरूढ़ हो कर्णके पराक्रमको देखा ।। ६४ १/२ ।।

काल्यमानं बलं दृष्ट्वा धर्मराजो युधिष्ठिरः ।। ६५ ।। स्वान् योधानब्रवीत् क्रुद्धो निघ्नतैतान् किमासत । अपनी सेनाको खदेड़ी जाती हुई देख धर्मराज युधिष्ठिरने कुपित हो अपने पक्षके योद्धाओंसे कहा—‘अरे! क्यों चुप बैठे हो? इन शत्रुओंको मार डालो’ ।।

ततो राज्ञाभ्यनुज्ञाताः पाण्डवानां महारथाः ।। ६६ ।। भीमसेनमुखाः सर्वे पुत्रांस्ते प्रत्युपाद्रवन् । राजाकी यह आज्ञा पाते ही भीमसेन आदि समस्त पाण्डव महारथी आपके पुत्रोंपर टूट पड़े ।। ६६ १/२ ।।