भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1965, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1965

अभवत् तुमुलः शब्दो योधानां तत्र भारत ।। ६७ ।। रथहस्त्यश्वपत्तीनां शस्त्राणां च ततस्ततः । भारत! फिर तो वहाँ इधर-उधर सब ओर रथी, हाथीसवार, घुड़सवार और पैदल योद्धाओं एवं अस्त्र-शस्त्रोंका भयंकर शब्द गूँजने लगा ।। ६७ १/२ ।। उत्तिष्ठत प्रहरत प्रैताभिपततेति च ।। ६८ ।। इति ब्रुवाणा ह्यन्योन्यं जघ्नुर्योधा महारणे । ‘उठो, मारो, आगे बढ़ो, टूट पड़ो’ इत्यादि वाक्य बोलते हुए सब योद्धा उस महासमरमें एक-दूसरेको मारने लगे ।। ६८ १/२ ।। अभ्रच्छायेव तत्रासीच्छरवॄष्टिभिरम्बरे ।। ६९ ।। समावृत्तैर्नरवरैर्निघ्नद्भिरितरेतरम् । उस समय वहाँ अस्त्रोंसे आवृत हो परस्पर आघात करनेवाले नरश्रेष्ठ वीरोंके चलाये हुए बाणोंकी वृष्टिसे आकाशमें मेघोंकी छाया-सी छा रही थी ।। ६९ १/२ ।। विपताकध्वजच्छत्रा व्यश्वसूतायुधा रणे ।। ७० ।। व्यङ्गाङ्गावयवाः पेतुः क्षितौ क्षीणाः क्षितीश्वराः । कितने ही घायल नरेश पताका, ध्वज, छत्र, अश्व, सारथि, आयुध, शरीर तथा उसके अवयवोंसे रहित हो रणभूमिमें गिर पड़े ।। ७० १/२ ।। प्रवणादिव शैलानां शिखराणि द्विपोत्तमाः ।। ७१ ।। सारोहा निहताः पेतुर्वज्रभिन्ना इवाद्रयः । जैसे पर्वतोंके शिखर टूटकर निम्न देशसे लुढ़कते हुए नीचे गिर पड़ते हैं तथा जैसे वज्रसे विदीर्ण किये हुए पर्वत धराशायी हो जाते हैं, उसी प्रकार वहाँ मारे गये हाथी अपने सवारोंसहित पृथ्वीपर गिर पड़े ।। ७१ १/२ ।। छिन्नभिन्नविपर्यस्तैर्वर्मलङ्कारभूषणैः ।। ७२ ।। सारोहास्तुरगाः पेतुर्हतवीराः सहस्रशः । टूटे-फूटे और अस्त-व्यस्त हुए कवच, अलंकार एवं आभूषणोंसहित सहस्रों घोड़े अपने बहादुर सवारोंके मारे जानेपर उनके साथ ही गिर पड़ते थे ।। ७२ १/२ ।। विप्रविद्धायुधाङ्गाश्च द्विरदाश्वरथैर्हताः ।। ७३ ।। प्रतिवीरैश्च सम्मर्दे पत्तिसंघाः सहस्रशः । उस संघर्षमें विपक्षी वीरों, हाथियों, घोड़ों तथा रथोंद्वारा मारे गये सहस्रों पैदल योद्धाओंके समुदाय रणभूमिमें सो रहे थे। उनके अस्त्र-शस्त्र और शरीरके अवयव क्षत-विक्षत होकर बिखर गये थे ।। ७३ १/२ ।। विशालायतताम्राक्षैः पद्मेन्दुसदृशाननैः ।। ७४ ।। शिरोभिर्युद्धशौण्डानां सर्वतः संवृता मही ।