महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1966, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंयथा भुवि तथा व्योम्नि निःस्वनं शुश्रुवुर्जनाः ।। ७५ ।। विमानैरप्सरःसङ्गैर्गीतवादित्रनिःस्वनैः । युद्धकुशल वीरोंके विशाल, विस्तृत एवं लाल-लाल आँखों और कमल तथा चन्द्रमाके समान मुखवाले मस्तकोंसे सारी युद्धभूमि सब ओरसे ढक गयी थी। भूतलपर जैसा कोलाहल हो रहा था, वैसा ही आकाशमें भी लोगोंको सुनायी देता था। वहाँ विमानोंपर बैठी हुई झुंड-की-झुंड अप्सराएँ गीत और वाद्योंकी मधुर ध्वनि फैला रही थीं ।। ७४-७५ १/२ ।। हतानभिमुखान् वीरान् वीरैः शतसहस्रशः ।। ७६ ।। आरोप्यारोप्य गच्छन्ति विमानेष्वप्सरोगणाः । वीरोंके द्वारा सम्मुख लड़कर मारे गये लाखों वीरोंको अप्सराएँ विमानोंपर बिठा-बिठाकर स्वर्गलोकमें ले जाती थीं ।। ७६ १/२ ।। तद् दृष्ट्वा महदाश्चर्यं प्रत्यक्षं स्वर्गलिप्सया ।। ७७ ।। प्रहृष्टमनसः शूराः क्षिप्रं जघ्नुः परस्परम् । यह महान् आश्चर्यकी बात प्रत्यक्ष देखकर हर्ष और उत्साहमें भरे हुए शूरवीर स्वर्गकी लिप्सासे एक-दूसरेको शीघ्रतापूर्वक मारने लगे ।। ७७ १/२ ।। रथिनो रथिभिः सार्धं चित्रं युयुधुराहवे ।। ७८ ।। पत्तयः पत्तिभिर्नागाः सह नागैर्हयैर्हयाः । युद्धस्थलमें रथियोंके साथ रथी, पैदलोंके साथ पैदल, हाथियोंके साथ हाथी और घोड़ोंके साथ घोड़े विचित्र युद्ध करते थे ।। ७८ १/२ ।। एवं प्रवृत्ते संग्रामे गजवाजिनरक्षये ।। ७९ ।। सैन्येन रजसा व्याप्ते स्वे स्वाञ्जघ्नुः परे परान् । इस प्रकार हाथी, घोड़ों और मनुष्योंका संहार करनेवाले उस संग्रामके आरम्भ होनेपर सैनिकोंद्वारा उड़ायी हुई धूलसे वहाँका सारा प्रदेश आच्छादित हो जानेपर अपने और शत्रुपक्षके योद्धा अपने ही पक्षवालोंका संहार करने लगे ।। ७९ १/२ ।। कचाकचि युद्धमासीद् दन्तादन्ति नखानखि ।। ८० ।। मुष्टियुद्धं नियुद्धं च देहपाप्मासुनाशनम् । दोनों दलोंके सैनिक एक-दूसरेके केश पकड़कर खींचते, दाँतोंसे काटते, नखोंसे बखोटते, मुक्कोंसे मारते और परस्पर मल्लयुद्ध करने लगते थे। इस प्रकार वह युद्ध सैनिकोंके शरीर, प्राण और पापोंका विनाश करनेवाला हो रहा था ।। ८० १/२ ।। तथा वर्तति संग्रामे गजवाजिनरक्षये ।। ८१ ।। नराश्वनागदेहेभ्यः प्रसृता लोहितापगा । गजाश्वनरदेहान् सा व्युवाह पतितान् बहून् ।। ८२ ।।