भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1971, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1971

**शल्य बोले—**कर्ण! क्रोधमें भरे हुए पाण्डुनन्दन महाबाहु भीमसेनको देखो, जो दीर्घकालसे संचित किये हुए क्रोधको आज तुम्हारे ऊपर छोड़नेका दृढ़ निश्चय किये हुए हैं॥ १५॥ ईदृशं नास्य रूपं मे दृष्टपूर्वं कदाचन । अभिमन्यौ हते कर्ण राक्षसे च घटोत्कचे ॥ १६ ॥ कर्ण! अभिमन्यु तथा घटोत्कच राक्षसके मारे जानेपर भी पहले कभी मैंने इनका ऐसा रूप नहीं देखा था॥ १६॥ त्रैलोक्यस्य समस्तस्य शक्तः क्रुद्धो निवारणे । बिभर्ति सदृशं रूपं युगान्ताग्निसमप्रभम् ॥ १७ ॥ ये इस समय कुपित हो समस्त त्रिलोकीको रोक देनेमें समर्थ हैं; क्योंकि प्रलयकालके अग्निके समान तेजस्वी रूप धारण कर रहे हैं॥ १७॥

संजय उवाच

इति ब्रुवति राधेयं मद्राणामीश्वरे नृप । अभ्यवर्तत वै कर्णं क्रोधदीप्तो वृकोदरः ॥ १८ ॥ **संजय कहते हैं—**नरेश्वर! मद्रराज शल्य राधापुत्र कर्णसे ऐसी बातें कह ही रहे थे कि क्रोधसे प्रज्वलित हुए भीमसेन उसके सामने आ पहुँचे॥ १८॥ अथागतं तु सम्प्रेक्ष्य भीमं युद्धाभिनन्दिनम् । अब्रवीद् वचनं शल्यं राधेयः प्रहसन्निव ॥ १९ ॥ युद्धका अभिनन्दन करनेवाले भीमसेनको सामने आया देख हँसते हुए-से राधापुत्र कर्णने शल्यसे इस प्रकार कहा— ॥ १९॥ यदुक्तं वचनं मेऽद्य त्वया मद्रजनेश्वर । भीमसेनं प्रति विभो तत् सत्यं नात्र संशयः ॥ २० ॥ 'मद्रराज! प्रभो! आज तुमने भीमसेनके विषयमें मेरे सामने जो बात कही है, वह सर्वथा सत्य है—इसमें संशय नहीं है॥ २०॥ एष शूरश्च वीरश्च क्रोधनश्च वृकोदरः । निरपेक्षः शरीरे च प्राणतश्च बलाधिकः ॥ २१ ॥ 'ये भीमसेन शूरवीर, क्रोधी, अपने शरीर और प्राणों-का मोह न करनेवाले तथा अधिक बलशाली हैं॥ २१॥ अज्ञातवासं वसता विराटनगरे तदा । द्रौपद्याः प्रियकामेन केवलं बाहुसंश्रयात् ॥ २२ ॥ गूढभावं समाश्रित्य कीचकः सगणो हतः ।