भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1972

‘विराटनगरमें अज्ञातवास करते समय इन्होंने द्रौपदीका प्रिय करनेकी इच्छासे छिपे-छिपे जाकर केवल बाहुबलसे कीचकको उसके साथियोंसहित मार डाला था ।। २२१/२ ।।
सोऽद्य संग्रामशिरसि संनद्धः क्रोधमूर्च्छितः ।। २३ ।।
किं करोद्यतदण्डेन मृत्युनापि व्रजेद् रणम् ।
‘वे ही आज क्रोधसे आतुर हो कवच बाँधकर युद्धके मुहानेपर उपस्थित हैं; परंतु क्या ये दण्ड धारण किये यमराजके साथ भी युद्धके लिये रणभूमिमें उतर सकते हैं?’ ।। २३१/२ ।।
चिरकालाभिलषितो मामयं तु मनोरथः ।। २४ ।।
अर्जुनं समरे हन्यां मां वा हन्याद् धनंजयः ।
स मे कदाचिदद्यैव भवेद् भीमसमागमात् ।। २५ ।।
‘मेरे हृदयमें दीर्घकालसे यह अभिलाषा बनी हुई है कि समरांगणमें अर्जुनका वध करूँ अथवा वे ही मुझे मार डालें। कदाचित् भीमसेनके साथ समागम होनेसे मेरी वह इच्छा आज ही पूरी हो जाय ।। २४-२५ ।।
निहते भीमसेने वा यदि वा विरथीकृते ।
अभियास्यति मां पार्थस्तन्मे साधु भविष्यति ।। २६ ।।
अत्र यन्मन्यसे प्राप्तं तच्छीघ्रं सम्प्रधारय ।
‘यदि भीमसेन मारे गये अथवा रथहीन कर दिये गये तो अर्जुन अवश्य मुझपर आक्रमण करेंगे, जो मेरे लिये अधिक अच्छा होगा। तुम जो यहाँ उचित समझते हो, वह शीघ्र निश्चय करके बताओ’ ।। २६१/२ ।।
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं राधेयस्यामितौजसः ।। २७ ।।
उवाच वचनं शल्यः सूतपुत्रं तथागतम् ।
अमित शक्तिशाली राधापुत्र कर्णका यह वचन सुनकर राजा शल्यने सूतपुत्रसे उस अवसरके लिये उपयुक्त वचन कहा— ।। २७१/२ ।।
अभियाहि महाबाहो भीमसेनं महाबलम् ।। २८ ।।
निरस्य भीमसेनं तु ततः प्राप्स्यसि फाल्गुनम् ।
‘महाबाहो! तुम महाबली भीमसेनपर चढ़ाई करो। भीमसेनको परास्त कर देनेपर निश्चय ही अर्जुनको अपने सामने पा जाओगे ।। २८१/२ ।।
यस्ते कामोऽभिलषितश्चिरात् प्रभृति हृद्गतः ।। २९ ।।
स वै सम्पत्स्यते कर्ण सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ।
‘कर्ण! तुम्हारे हृदयमें चिरकालसे जो अभीष्ट मनोरथ संचित है, वह निश्चय ही सफल होगा, यह मैं तुमसे सत्य कहता हूँ’ ।। २९१/२ ।।
एवमुक्ते ततः कर्णः शल्यं पुनरभाषत ।। ३० ।।