भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 2006, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 2006

राजन्! समरभूमिमें कुपित हुए राम और रावणके समान उन दोनों वीरोंमें दो घड़ीतक बड़ा भयंकर युद्ध चलता रहा। ततः शिखण्डी कुपितः शरैः सप्तभिराहवे । कृपं विव्याध कुपितं कङ्कपत्रैरजिह्मगैः ॥ ७ ॥ तत्पश्चात् शिखण्डीने क्रोधमें भरकर युद्धस्थलमें कंकपत्रयुक्त सात सीधे बाणोंद्वारा कुपित कृपाचार्यको क्षत-विक्षत कर दिया ॥ ७ ॥ ततः कृपः शरैस्तीक्ष्णैः सोऽतिविद्धो महारथः । व्यश्वसूतस्थं चक्रे शिखण्डिनमथो द्विजः ॥ ८ ॥ उन तीखे बाणोंसे अत्यन्त घायल हुए महारथी विप्रवर कृपाचार्यने शिखण्डीको घोड़े, सारथि एवं रथसे रहित कर दिया ॥ ८ ॥ हताश्वात् तु ततो यानादवप्लुत्य महारथः । खड्गं चर्म तथा गृह्य सत्वरं ब्राह्मणं ययौ ॥ ९ ॥ तब महारथी शिखण्डी उस अश्वहीन रथसे कूदकर हाथोंमें ढाल और तलवार ले तुरंत ही ब्राह्मण कृपाचार्यकी ओर चला ॥ ९ ॥

तमापतन्तं सहसा शरैः संनतपर्वभिः ।