महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2007, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंछादयामास समरे तदद्भुतमिवाभवत् ॥ १० ॥ उसे अपने ऊपर सहसा आक्रमण करते देख कृपाचार्यने झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा समरांगणमें शिखण्डीको ढक दिया, यह अद्भुत-सी बात हुई ॥ १० ॥ तत्राद्भुतमपश्याम शिलानां प्लवनं यथा । निश्चेष्टस्तद् रणे राजन् शिखण्डी समतिष्ठत ॥ ११ ॥ राजन्! रणक्षेत्रमें शिखण्डी निश्चेष्ट होकर खड़ा रहा, यह वहाँ पत्थरके तैरनेके समान हमलोगोंने अद्भुत बात देखी ॥ ११ ॥ कृपेणच्छादितं दृष्ट्वा नृपोत्तम शिखण्डिनम् । प्रत्युद्ययौ कृपं तूर्णं धृष्टद्युम्नो महारथः ॥ १२ ॥ नृपश्रेष्ठ! शिखण्डीको कृपाचार्यके बाणोंसे आच्छादित हुआ देख महारथी धृष्टद्युम्न तुरंत ही उनका सामना करनेके लिये आये ॥ १२ ॥ धृष्टद्युम्नं ततो यान्तं शारद्वतरथं प्रति । प्रतिजग्राह वेगेन कृतवर्मा महारथः ॥ १३ ॥ धृष्टद्युम्नको कृपाचार्यके रथकी ओर जाते देख महारथी कृतवर्माने वेगपूर्वक उन्हें रोक दिया ॥ १३ ॥ युधिष्ठिरमथायान्तं शारद्वतरथं प्रति । सपुत्रं सहसैन्यं च द्रोणपुत्रो न्यवारयत् ॥ १४ ॥ इसी प्रकार पुत्र और सेनासहित युधिष्ठिरको कृपाचार्यके रथपर चढ़ाई करते देख द्रोणपुत्र अश्वत्थामाने रोका ॥ १४ ॥ नकुलं सहदेवं च त्वरमाणौ महारथौ । प्रतिजग्राह ते पुत्रः शरवर्षेण वारयन् ॥ १५ ॥ महारथी नकुल और सहदेव भी बड़ी उतावलीके साथ चढ़े आ रहे थे, उन्हें भी आपके पुत्रने बाण-वर्षासे रोक दिया ॥ १५ ॥ भीमसेनं करूषांश्च केकयान् सह सृञ्जयैः । कर्णो वैकर्तनो युद्धे वारयामास भारत ॥ १६ ॥ भारत! भीमसेनको तथा करूष, केकय और सृंजय योद्धाओंको वैकर्तन कर्णने युद्धमें आगे बढ़नेसे रोका ॥ १६ ॥ शिखण्डिनस्ततो बाणान् कृपः शारद्वतो युधि । प्राहिणोत् त्वरया युक्तो दिधक्षुरिव मारिष ॥ १७ ॥ मान्यवर! शरद्वान्के पुत्र कृपाचार्य युद्धस्थलमें, मानो वे शिखण्डीको दग्ध कर डालना चाहते हों, बड़ी उतावलीके साथ उसके ऊपर बाण चलाये ॥ १७ ॥ ताञ्छरान् प्रेषितांस्तेन समन्तात् स्वर्णभूषितान् । चिच्छेद खड्गमाविध्य भ्रामयंश्च पुनः पुनः ॥ १८ ॥