भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2029

‘उधर वह संजयोंकी विशाल सेना भी महासमरमें विदीर्ण हो रही है। श्रीकृष्ण! वह हाथीकी रस्सीके चिह्नसे युक्त बुद्धिमान् कर्णका ध्वज दिखायी दे रहा है। वह राजाओंकी सेनाके बीच सानन्द विचरण कर रहा है ।। ८४-८५ ।।

न च कर्णं रणे शक्ता जेतुमन्ये महारथाः ।
जानीते हि भवान् कर्णं वीर्यवन्तं पराक्रमे ।। ८६ ।।
‘जनार्दन! आप तो जानते ही हैं कि कर्ण कितना बलवान् तथा पराक्रम प्रकट करनेमें समर्थ है। अतः रणभूमिमें दूसरे महारथी उसे जीत नहीं सकते हैं ।। ८६ ।।

तत्र याहि यतः कर्णो द्रावयत्येष नो बलम् ।
वर्जयित्वा रणे याहि सूतपुत्रं महारथम् ।। ८७ ।।
एतन्मे रोचते कृष्ण यथा वा तव रोचते ।
‘श्रीकृष्ण! जहाँ यह कर्ण हमारी सेनाको खदेड़ रहा है, वहीं चलिये। रणभूमिमें संशप्तकोंको छोड़कर अब महारथी सूतपुत्रके ही पास रथ ले चलिये। ‘मुझे यही ठीक जान पड़ता है अथवा आपको जैसा जँचे, वैसा कीजिये’ ।।

एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य गोविन्दः प्रहसन्निव ।। ८८ ।।
अब्रवीदर्जुनं तूर्णं कौरवाञ्जहि पाण्डव ।
अर्जुनकी यह बात सुनकर भगवान् श्रीकृष्णने उनसे हँसते हुए-से कहा—‘पाण्डुनन्दन! तुम शीघ्र ही कौरव-सैनिकोंका संहार करो’ ।। ८८ १/२ ।।

ततस्तव महासैन्यं गोविन्दप्रेरिता हयाः ।। ८९ ।।
हंसवर्णाः प्रविविशुर्वहन्तः कृष्णपाण्डवौ ।
राजन्! तदनन्तर श्रीकृष्णके द्वारा हाँके गये हंसके समान श्वेत रंगवाले घोड़े श्रीकृष्ण और अर्जुनको लेकर आपकी विशाल सेनामें घुस गये ।। ८९ १/२ ।।

केशवप्रेरितैरश्वैः श्वेतैः काञ्चनभूषणैः ।। ९० ।।
प्रविशद्भिस्तव बलं चतुर्दिशमभिद्यत ।
श्रीकृष्णद्वारा संचालित हुए उन सुवर्णभूषित श्वेत अश्वोंके प्रवेश करते ही आपकी सेनामें चारों ओर भगदड़ मच गयी ।। ९० १/२ ।।