भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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अर्जुनके द्वारा संशप्तकोंका संहार

मेघस्तनितनिर्ह्रादः स रथो वानरध्वजः ।। ९१ ।।
चलत्पताकस्तां सेनां विमानं द्यामिवाविशत् ।
जैसे कोई विमान स्वर्गलोकमें प्रवेश कर रहा हो, उसी प्रकार चंचल पताकाओंसे युक्त वह कपिध्वज रथ मेघोंकी गर्जनाके समान गम्भीर घोष करता हुआ उस सेनामें जा घुसा ।। ९१ १/२ ।।
तौ विदार्य महासेनां प्रविष्टौ केशवार्जुनौ ।। ९२ ।।
क्रुद्धौ संरम्भरक्ताक्षौ व्यभ्राजेतां महाद्युती ।
उस विशाल सेनाको विदीर्ण करके उसके भीतर प्रविष्ट हुए वे दोनों श्रीकृष्ण और अर्जुन अपने महान् तेजसे प्रकाशित हो रहे थे। उनके मनमें शत्रुओंके प्रति क्रोध भरा हुआ था और उनकी आँखें रोषसे लाल हो रही थीं ।। ९२ १/२ ।।
युद्धशौण्डौ समाहूतावागतौ तौ रणाध्वरम् ।। ९३ ।।
यज्वभिर्विधिनाहूतौ मखे देवाविवाश्विनौ ।