भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2034

रथोंके घोड़े और सारथि, घोड़ोंके सवार, हाथियोंके आरोही, महावत और स्वयं हाथी भी मारे गये थे। महाराज! इन सबने परस्पर प्रहार करके घोर जनसंहार मचा दिया था॥ ११६-११७॥

तस्मिन् प्रपक्षे पक्षे च निहते सव्यसाचिना। अर्जुनं जयतां श्रेष्ठं त्वरितो द्रौणिरभ्ययात्॥ ११८॥ विधुन्वानो महच्चापं कार्तस्वरविभूषितम्। आददानः शरान् घोरान् स्वरश्मीनिव भास्करः॥ ११९॥ उस युद्धमें जब सव्यसाची अर्जुनने शत्रुओंके पक्ष और प्रपक्ष दोनोंको मार गिराया, तब द्रोणपुत्र अश्वत्थामा अपने सुवर्णभूषित विशाल धनुषको हिलाता और अपनी किरणोंको धारण करनेवाले सूर्यदेवके समान भयंकर बाण हाथमें लेता हुआ तुरंत विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ अर्जुनके सामने आ पहुँचा॥ ११८-११९॥

क्रोधामर्षविवृत्तास्यो लोहिताक्षो बभौ बली। अन्तकाले यथा क्रुद्धो मृत्युः किङ्करदण्डभृत्॥ १२०॥ उस समय क्रोध और अमर्षसे उसका मुँह खुला हुआ था, नेत्र रक्तवर्ण हो रहे थे तथा वह बलवान् अश्वत्थामा अन्तकालमें किंकर नामक दण्ड धारण करनेवाले कुपित यमराजके समान जान पड़ता था॥ १२०॥

ततः प्रासृजदुग्राणि शरवर्षाणि संघशः। तैर्विसृष्टैर्महाराज व्यद्रवत् पाण्डवी चमूः॥ १२१॥ महाराज! तत्पश्चात् वह समूह-के-समूह भयंकर बाणोंकी वर्षा करने लगा। उसके छोड़े हुए बाणोंसे व्यथित हो पाण्डव-सेना भागने लगी॥ १२१॥

स दृष्ट्वैव तु दाशार्हं स्यन्दनस्थं विशाम्पते। पुनः प्रासृजदुग्राणि शरवर्षाणि मारिष॥ १२२॥ माननीय प्रजानाथ! वह रथपर बैठे हुए श्रीकृष्णकी ओर देखकर ही पुनः उनके ऊपर भयानक बाणोंकी वृष्टि करने लगा॥ १२२॥

तैः पतद्भिर्महाराज द्रौणिमुक्तैः समन्ततः। संछादितौ रथस्थौ तावुभौ कृष्णधनंजयौ॥ १२३॥ महाराज! अश्वत्थामाके हाथोंसे छूटकर सब ओर गिरनेवाले उन बाणोंसे रथपर बैठे हुए श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनों ही ढक गये॥ १२३॥

ततः शरशतैस्तीक्ष्णैरश्वत्थामा प्रतापवान्। निश्चेष्टौ तावुभौ युद्धे चक्रे माधवपाण्डवौ॥ १२४॥ तत्पश्चात् प्रतापी अश्वत्थामाने सैकड़ों तीखे बाणोंद्वारा श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनोंको युद्धस्थलमें निश्चेष्ट कर दिया॥ १२४॥

हाहाकृतमभूत् सर्वं स्थावरं जङ्गमं तथा।