भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2035

चराचरस्य गोप्तारौ दृष्ट्वा संछादितौ शरैः ॥ १२५ ॥ चराचर जगत्‌की रक्षा करनेवाले उन दोनों वीरोंको बाणोंसे आच्छादित हुआ देख स्थावर-जंगम समस्त प्राणी हाहाकार कर उठे ॥ १२५ ॥ सिद्धचारणसंघाश्च सम्पेतुस्ते समन्ततः । चिन्तयन्तो भवेद्य लोकानां स्वस्त्यपीति च ॥ १२६ ॥ सिद्धों और चारणोंके समुदाय सब ओरसे वहाँ आ पहुँचे और यह चिन्तन करने लगे कि ‘आज सम्पूर्ण जगत्‌का कल्याण हो’ ॥ १२६ ॥ न मया तादृशो राजन् दृष्टपूर्वः पराक्रमः । संग्रामे यादृशो द्रौणेः कृष्णौ संछादयिष्यतः ॥ १२७ ॥ राजन्! समरांगणमें श्रीकृष्ण और अर्जुनको बाणोंद्वारा आच्छादित करनेवाले अश्वत्थामाका जैसा पराक्रम उस दिन देखा गया, वैसा मैंने पहले कभी नहीं देखा था ॥ १२७ ॥ द्रौणेस्तु धनुषः शब्दमहित्रासनं रणे । अश्रौषं बहुशो राजन् सिंहस्य निनदो यथा ॥ १२८ ॥ महाराज! मैंने रणभूमिमें अश्वत्थामाके धनुषकी शत्रुओंको भयभीत कर देनेवाली टंकार बारंबार सुनी, मानो किसी सिंहके दहाड़नेकी आवाज हो रही हो ॥ ज्या चास्य चरतो युद्धे सव्यदक्षिणमस्यतः । विद्युदम्बुदमध्यस्था भ्राजमानेव साभवत् ॥ १२९ ॥ जैसे मेघोंकी घटाके बीचमें बिजली चमकती है, उसी प्रकार युद्धमें दायें-बायें बाण-वर्षापूर्वक विचरते हुए अश्वत्थामाके धनुषकी प्रत्यंचा भी प्रकाशित हो रही थी ॥ १२९ ॥ स तथा क्षिप्रकारी च दृढहस्तश्च पाण्डवः । प्रमोहं परमं गत्वा प्रेक्ष्य तं द्रोणजं ततः ॥ १३० ॥ विक्रमं विहतं मेन आत्मनः स महायशाः । तस्यास्य समरे राजन् वपुरासीत् सुदुर्द्दशम् ॥ १३१ ॥ युद्धमें फुर्ती करने और दृढ़तापूर्वक हाथ चलानेवाले महायशस्वी पाण्डुनन्दन अर्जुन द्रोणकुमारकी ओर देखकर भारी मोहमें पड़ गये और अपने पराक्रमको प्रतिहत हुआ मानने लगे। राजन्! उस समरांगणमें अश्वत्थामाके शरीरकी ओर देखना भी अत्यन्त कठिन हो रहा था ॥ १३०-१३१ ॥ द्रौणिपाण्डवयोरेवं वर्तमाने महारणे । वर्धमाने च राजेन्द्र द्रोणपुत्रे महाबले ॥ १३२ ॥ हीयमाने च कौन्तेये कृष्णे रोषः समाविशत् ।