महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2036, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंराजेन्द्र! इस प्रकार अश्वत्थामा और अर्जुनमें महान् युद्ध आरम्भ होनेपर जब महाबली द्रोणपुत्र बढ़ने लगा और कुन्तीकुमार अर्जुनका पराक्रम मन्द पड़ने लगा, तब भगवान् श्रीकृष्णको बड़ा क्रोध हुआ ॥ १३२ १/२ ॥
स रोषान्निःश्वसन् राजन् निर्दहन्निव चक्षुषा ॥ १३३ ॥
द्रौणिं ह्यपश्यत् संग्रामे फाल्गुनं च मुहुर्मुहुः ।
राजन्! वे रोषसे लंबी साँस खींचते और अपने नेत्रोंद्वारा दग्ध-सा करते हुए युद्धस्थलमें अश्वत्थामा और अर्जुनकी ओर बारंबार देखने लगे ॥ १३३ १/२ ॥
ततः क्रुद्धोऽब्रवीत् कृष्णः पार्थं सप्रणयं तदा ॥ १३४ ॥
अत्यद्भुतमिदं पार्थ तव पश्यामि संयुगे ।
अतिशेते हि यत्र त्वां द्रोणपुत्रोऽद्य भारत ॥ १३५ ॥
तत्पश्चात् क्रोधमें भरे हुए श्रीकृष्ण उस समय अर्जुनसे प्रेमपूर्वक बोले—'पार्थ! युद्धस्थलमें तुम्हारा यह उपेक्षायुक्त अद्भुत बर्ताव देख रहा हूँ। भारत! आज द्रोणपुत्र अश्वत्थामा तुमसे सर्वथा बढ़ता जा रहा है ॥ १३४-१३५ ॥
कच्चिद् वीर्यं यथापूर्वं भुजयोर्वा बलं तव ।
कच्चित् ते गाण्डिवं हस्ते रथे तिष्ठसि चार्जुन ॥ १३६ ॥
'अर्जुन! तुम्हारी शारीरिक शक्ति पहलेके समान ही ठीक है न? अथवा तुम्हारी भुजाओंमें पूर्ववत् बल तो है न? तुम्हारे हाथमें गाण्डीव धनुष तो है न? और तुम रथपर ही खड़े हो न? ॥ १३६ ॥
कच्चित् कुशलिनौ बाहू मुष्टिर्वा न व्यशीर्यत ।
उदीर्यमाणं हि रणे पश्यामि द्रौणिमाहवे ॥ १३७ ॥
'क्या तुम्हारी दोनों भुजाएँ सकुशल हैं? तुम्हारी मुट्ठी तो ढीली नहीं हो गयी है? अर्जुन! मैं देखता हूँ कि युद्धस्थलमें अश्वत्थामा तुमसे बढ़ा जा रहा है ॥ १३७ ॥
गुरुपुत्र इति ह्येनं मानयन् भरतर्षभ ।
उपेक्षां कुरु मा पार्थ नायं काल उपेक्षितुम् ॥ १३८ ॥
'भरतश्रेष्ठ! कुन्तीनन्दन! यह मेरे गुरुका पुत्र है, ऐसा मानकर तुम इसके प्रति उपेक्षाभाव न करो। यह समय उपेक्षा करनेका नहीं है' ॥ १३८ ॥
एवमुक्तस्तु कृष्णेन गृह्य भल्लांश्चतुर्दश ।
त्वरमाणस्त्वराकाले द्रौणेर्धनुरथच्छिनत् ॥ १३९ ॥
ध्वजं छत्रं पताकाश्च खड्गं शक्तिं गदां तथा ।
जत्रुदेशे च सुभृशं वत्सदन्तैरताडयत् ॥ १४० ॥
भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर अर्जुनने चौदह भल्ल हाथमें लेकर शीघ्रता करनेके अवसरपर फुर्ती दिखायी और अश्वत्थामाके धनुषको काट डाला। साथ ही उसके ध्वज,