महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2047, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंजलं त्यक्त्वा प्रधावन्ति क्रोशमानाः परस्परम् । 'अर्जुन! कितने ही योद्धा पानी लानेके लिये गये, इसी बीचमें पानी चाहनेवाले बहुत-से वीरोंके प्राण निकल गये। वे शूरवीर जब पानी लेकर लौटे हैं, तब अपने उन सम्बन्धियोंको चेतनारहित देखकर पानीको वहीं फेंक परस्पर चीखते-चिल्लाते हुए चारों ओर दौड़ रहे हैं॥ ३८ १/२ ॥
जलं पीत्वा मृतान् पश्य पिबतोऽन्यांश्च मारिष ॥ ३९ ॥
परित्यज्य प्रियानन्ये बान्धवान् बान्धवप्रियाः ।
व्युत्क्रान्ताः समदृश्यन्त तत्र तत्र महारणे ॥ ४० ॥
'श्रेष्ठ वीर अर्जुन! उधर देखो, कुछ लोग पानी पीकर मर गये और कुछ लोग पीते-पीते ही अपने प्राण खो बैठे। कितने ही बान्धवजनोंके प्रेमी सैनिक अपने प्रिय बान्धवोंको छोड़कर उस महासमरमें जहाँ-तहाँ प्राणशून्य हुए दिखायी देते हैं ॥ ३९-४० ॥
तथापरान् नरश्रेष्ठ संदष्टौष्ठपुटान् पुनः ।
भ्रुकुटीकुटिलैर्वक्त्रैः प्रेक्षमाणान् समन्ततः ॥ ४१ ॥
'नरश्रेष्ठ! उन दूसरे योद्धाओंको देखो, जो दाँतोंसे ओठ चबाते हुए टेढ़ी भौंहोंसे युक्त मुखोंद्वारा चारों ओर दृष्टिपात कर रहे हैं' ॥ ४१ ॥
एवं ब्रुवंस्तदा कृष्णो ययौ यत्र युधिष्ठिरः ।
अर्जुनश्चापि नृपतेर्दर्शनार्थं महारणे ॥ ४२ ॥
इस प्रकार बातें करते हुए भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन उस महासमरमें राजाका दर्शन करनेके लिये उस स्थानकी ओर चल दिये, जहाँ राजा युधिष्ठिर विद्यमान थे ॥ ४२ ॥
याहि याहीति गोविन्दं मुहुर्मुहुरचोदयत् ।
तां युद्धभूमिं पार्थस्य दर्शयित्वा च माधवः ॥ ४३ ॥
त्वरमाणस्ततः कृष्णः पार्थमाह शनैरिदम् ।
पश्य पाण्डव राजानमुपयातांश्च पार्थिवान् ॥ ४४ ॥
अर्जुन भगवान् श्रीकृष्णसे बारंबार कहते थे, 'चलिये, चलिये'। भगवान् श्रीकृष्ण बड़ी उतावलीके साथ अर्जुनको युद्धभूमिका दर्शन कराते हुए आगे बढ़े और धीरे-धीरे उनसे इस प्रकार बोले—'पाण्डुनन्दन! देखो, राजाके पास बहुत-से भूपाल जा पहुँचे हैं ॥ ४३-४४ ॥
कर्णं पश्य महारङ्गे ज्वलन्तमिव पावकम् ।
असौ भीमो महेष्वासः संनिवृत्तो रणं प्रति ॥ ४५ ॥
'उधर दृष्टिपात करो। कर्ण युद्धके महान् रंगमंचपर प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित हो रहा है और महाधनुर्धर भीमसेन युद्धस्थलकी ओर लौट पड़े हैं ॥ ४५ ॥
तमेते विनिवर्तन्ते धृष्टद्युम्नपुरोगमाः ।
पाञ्चालसृञ्जयानां च पाण्डवानां च ये मुखम् ॥ ४६ ॥