भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2046

बद्धाः सादिभुजाग्रेषु सुवर्णविकृताः कशाः ।। ३० ।। ‘जिनमें वैदूर्यमणिके डंडे लगे हुए हैं, ऐसे बहुत-से सुन्दर अंकुश पृथ्वीपर पड़े हैं। सवारोंके हाथोंमें सटे हुए कितने ही सुवर्णनिर्मित कोड़े कटकर गिरे हैं ।। ३० ।। विचित्रमणिचित्रांश्च जातरूपपरिष्कृतान् । अश्वास्तरपरिस्तोमान् राङ्कवान् पतितान् भुवि ।। ३१ ।। ‘विचित्र मणियोंसे जटिल और सोनेके तारोंसे विभूषित रंकुमृगके चमड़ेके बने हुए, घोड़ोंकी पीठपर बिछाये जानेवाले बहुत-से झूल भूमिपर पड़े हैं ।। ३१ ।। चूडामणीन् नरेन्द्राणां विचित्राः काञ्चनस्रजः । छत्राणि चापविद्धानि चामरव्यजनानि च ।। ३२ ।। ‘नरपतियोंके मणिमय मुकुट, विचित्र स्वर्णमय हार, छत्र, चँवर और व्यजन फेंके पड़े हैं ।। ३२ ।। चन्द्रनक्षत्रभासैश्च वदनैश्चारुकुण्डलैः । क्लृप्तश्मश्रुभिरत्यर्थं वीराणां समलंकृतैः ।। ३३ ।। वदनैः पश्य संछन्नां महीं शोणितकर्दमाम् । ‘देखो, चन्द्रमा और नक्षत्रोंके समान कान्तिमान्, मनोहर कुण्डलोंसे विभूषित तथा दाढ़ी-मूँछसे युक्त वीरोंके आभूषणभूषित मुखोंसे रणभूमि अत्यन्त आच्छादित हो गयी है और इसपर रक्तकी कीच जम गयी है ।। ३३ १/२ ।। सजीवांश्चापरान् पश्य कूजमानान् समन्ततः ।। ३४ ।। उपास्यमानान् बहुशो न्यस्तशस्त्रैर्विशाम्पते । ज्ञातिभिः सहितांस्तत्र रोदमानैर्मुहुर्मुहुः ।। ३५ ।। ‘प्रजापालक अर्जुन! उन दूसरे योद्धाओंपर दृष्टिपात करो जिनके प्राण अभीतक शेष हैं और जो चारों ओर कराह रहे हैं। उनके बहुसंख्यक कुटुम्बीजन हथियार डालकर उनके निकट आ बैठे हैं और बारंबार रो रहे हैं ।। ३४-३५ ।। व्युत्क्रान्तानपरान् योधांश्छादयित्वा तरस्विनः । पुनर्युद्धाय गच्छन्ति जयगृद्धाः प्रमन्यवः ।। ३६ ।। ‘जिनके प्राण निकल गये हैं, उन योद्धाओंको वस्त्र आदिसे ढककर विजयाभिलाषी वेगशाली वीर पुनः अत्यन्त क्रोधपूर्वक युद्धके लिये जा रहे हैं ।। ३६ ।। अपरे तत्र तत्रैव परिधावन्ति मानवाः । ज्ञातिभिः पतितैः शूरैर्याच्यमानास्तथोदकम् ।। ३७ ।। ‘दूसरे बहुत-से सैनिक रणभूमिमें गिरे हुए अपने शूरवीर कुटुम्बीजनोंके पानी माँगनेपर वहीं इधर-उधर दौड़ रहे हैं ।। ३७ ।। जलार्थं च गताः केचिन्निष्प्राणा बहवोऽर्जुन । संनिवृत्ताश्च ते शूरास्तान् वै दृष्ट्वा विचेतसः ।। ३८ ।।