महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2045, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंहस्तिहस्तोपमैश्छिन्नैरूरुभिश्च तरस्विनाम् । बद्धचूडामणिवरैः शिरोभिश्च सकुण्डलैः ॥ २३ ॥ पतितैर्ऋषभाक्षाणां विराजति वसुंधरा । ‘साँड़के समान विशाल नेत्रोंवाले वेगशाली वीरोंके दस्तानोंसहित आभूषणभूषित हाथ कटकर गिरे हैं। हाथियोंके शुण्डदण्डोंके समान मोटी जाँघें खण्डित होकर पड़ी हैं तथा श्रेष्ठ चूड़ामणि धारण किये कुण्डलमण्डित मस्तक भी धड़से अलग होकर पड़े हैं। इन सबके द्वारा रणभूमिकी अपूर्व शोभा हो रही है ॥ २२-२३ १/२ ॥ कबन्धेः शोणितादिग्धैश्छिन्नगात्रशिरोधरैः ॥ २४ ॥ भूर्भाति भरतश्रेष्ठ शान्तार्चिर्भिरिवाग्निभिः । ‘भरतश्रेष्ठ! जिनकी गर्दन कट गयी है, विभिन्न अंग छिन्न-भिन्न हो गये हैं तथा जो खूनसे लथपथ होकर लाल दिखायी देते हैं, उन कबन्धों (धड़ों)-से रणभूमि ऐसी जान पड़ती है, मानो वहाँ जगह-जगह बुझी हुई लपटोंवाले आगके अंगारे पड़े हों ॥ २४ १/२ ॥ रथांश्च बहुधा भग्नान् हेमकिङ्किणिनः शुभान् ॥ २५ ॥ वाजिनश्च हतान् पश्य निष्कीर्णान्त्राञ्छराहतान् । ‘देखो, जिनमें सोनेकी छोटी-छोटी घंटियाँ लगी हैं, ऐसे बहुत-से सुन्दर रथ टुकड़े-टुकड़े होकर पड़े हैं। वे बाणोंसे घायल हुए घोड़े मरे पड़े हैं और उनकी आँतें बाहर निकल आयी हैं ॥ २५ १/२ ॥ अनुकर्षानूपासंगान् पताका विविधध्वजान् ॥ २६ ॥ रथिनां च महाशङ्खान् पाण्डरांश्च प्रकीर्णकान् । ‘अनुकर्ष, उपासंग, पताका, नाना प्रकारके ध्वज तथा रथियोंके बड़े-बड़े श्वेत शंख बिखरे पड़े हैं ॥ निरस्तजिह्वान् मातङ्गान् शयानान् पर्वतोपमान् ॥ २७ ॥ वैजयन्तीर्विचित्राश्च हतांश्च गजवाजिनः । ‘जिनकी जीभें बाहर निकल आयी हैं, ऐसे अगणित पर्वताकार हाथी धरतीपर सदाके लिये सो गये हैं। विचित्र वैजयन्ती पताकाएँ खण्डित होकर पड़ी हैं तथा हाथी और घोड़े मारे गये हैं ॥ २७ १/२ ॥ वारणानां परिस्तोमांस्तथैवाजिनकम्बलान् ॥ २८ ॥ विपाटितविचित्रांश्च रूप्यचित्रान् कुथाङ्कुशान् । भिन्नांश्च बहुधा घण्टा महद्भिः पतितैर्गजैः ॥ २९ ॥ ‘हाथियोंके विचित्र झूल, मृगचर्म और कम्बल चिथड़े-चिथड़े होकर गिरे हैं। चाँदीके तारोंसे चित्रित झूल, अंकुश और अनेक टुकड़ोंमें बँटे हुए बहुत-से घंटे महान् गजराजोंके साथ ही धरतीपर गिरे पड़े हैं ॥ २८-२९ ॥ वैदूर्यदण्डांश्च शुभान् पतितानङ्कुशान् भुवि ।