महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2074, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंयुधामन्युं महेष्वासं गौतमोऽभ्यपतद्रणे । कृतवर्मा च बलवानुत्तमौजसमाद्रवत् ॥ १४ ॥ कृपाचार्य युद्धस्थलमें महाधनुर्धर युधामन्युपर टूट पड़े और बलवान् कृतवर्माने उत्तमौजापर आक्रमण किया ॥ १४ ॥
भीमसेनः कुरून् सर्वान् पुत्रांश्च तव मारिष । सहानीकान् महाबाहुरेक एव न्यवारयत् ॥ १५ ॥ आर्य! महाबाहु भीमसेनने अकेले ही सेनासहित समस्त कौरवों और आपके पुत्रोंको आगे बढ़नेसे रोक दिया ॥ १५ ॥
शिखण्डी तु ततः कर्णं विचरन्तमभीतवत् । भीष्महन्ता महाराज वारयामास पत्रिभिः ॥ १६ ॥ महाराज! तदनन्तर भीष्महन्ता शिखण्डीने निर्भय-से विचरते हुए कर्णको अपने बाणोंके प्रहारसे रोका ॥ १६ ॥
प्रतिरुद्धस्ततः कर्णो रोषात् प्रस्फुरिताधरः । शिखण्डिनं त्रिभिर्बाणैर्भ्रुवोर्मध्येऽभ्यताडयत् ॥ १७ ॥ अपनी गति अवरुद्ध हो जानेपर रोषके मारे कर्णके ओठ फड़कने लगे। उसने तीन बाणोंद्वारा शिखण्डीको उसकी दोनों भौंहोंके मध्यभागमें गहरी चोट पहुँचायी ॥ १७ ॥
धारयंस्तु स तान् बाणान् शिखण्डी बह्वशोभत । रजत: पर्वतो यद्वत् त्रिभिः शृङ्गैरिवोत्थितैः ॥ १८ ॥ उन बाणोंको ललाटमें धारण किये शिखण्डी तीन उठे हुए शिखरोंसे संयुक्त रजतमय पर्वतके समान बड़ी शोभा पाने लगा ॥ १८ ॥
सोऽतिविद्धो महेष्वासः सूतपुत्रेण संयुगे । कर्णं विव्याध समरे नवत्या निशितैः शरैः ॥ १९ ॥ युद्धस्थलमें सूतपुत्रके द्वारा अत्यन्त घायल किये हुए महाधनुर्धर शिखण्डीने नब्बे पैने बाणोंद्वारा कर्णको भी समरभूमिमें घायल कर दिया ॥ १९ ॥
तस्य कर्णो हयान् हत्वा सारथिं च त्रिभिः शरैः । उन्ममाथ ध्वजं चास्य क्षुरप्रेण महारथः ॥ २० ॥ महारथी कर्णने शिखण्डीके घोड़ोंको मारकर तीन बाणोंद्वारा इसके सारथिको भी नष्ट कर दिया। फिर एक क्षुरप्रद्वारा उसकी ध्वजाको काट गिराया ॥ २० ॥
हताश्वात्तु ततो यानादवप्लुत्य महारथः । शक्तिं चिक्षेप कर्णाय संक्रुद्धः शत्रुतापनः ॥ २१ ॥ उस अश्वहीन रथसे कूदकर कुपित हुए शत्रुसंतापी महारथी शिखण्डीने कर्णपर शक्ति चलायी ॥ २१ ॥
तां छित्त्वा समरे कर्णस्त्रिभिर्भारत सायकैः ।