महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2075, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंशिखण्डिनमथाविध्यन्नवभिर्निशितैः शरैः ।। २२ ।।
भारत! समरांगणमें तीन बाणोंद्वारा उस शक्तिको काटकर कर्णने नौ तीखे बाणोंसे शिखण्डीको भी घायल कर दिया ।। २२ ।।
कर्णचापच्युतान् बाणान् वर्जयंस्तु नरोत्तमः ।
अपयातस्ततस्तूर्णं शिखण्डी भृशविक्षतः ।। २३ ।।
तब अत्यन्त घायल हुआ नरश्रेष्ठ शिखण्डी कर्णके धनुषसे छूटे हुए बाणोंसे बचनेके लिये तुरंत वहाँसे भाग निकला ।। २३ ।।
ततः कर्णो महाराज पाण्डुसैन्यान्यशातयत् ।
तूलराशिं समासाद्य यथा वायुर्महाबलः ।। २४ ।।
महाराज! तदनन्तर महाबली कर्ण रूईके ढेरको वायुकी भाँति पाण्डव-सेनाओंको तहस-नहस करने लगा ।। २४ ।।
धृष्टद्युम्नो महाराज तव पुत्रेण पीडितः ।
दुःशासनं त्रिभिर्बाणैः प्रत्यविध्यत् स्तनान्तरे ।। २५ ।।
राजेन्द्र! आपके पुत्र दुःशासनसे पीड़ित हो धृष्टद्युम्नने तीन बाणोंसे उसकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी ।। २५ ।।
तस्य दुःशासनो बाहुं सव्यं विव्याध मारिष ।
स तेन रुक्मपुङ्खेन भल्लेनानतपर्वणा ।। २६ ।।
धृष्टद्युम्नस्तु निर्विद्धः शरं घोरममर्षणः ।
दुःशासनाय संक्रुद्धः प्रेषयामास भारत ।। २७ ।।
आर्य! दुःशासनने भी उसकी बायीं भुजाको बींध डाला। भारत! सुनहरे पंख और झुकी हुई गाँठवाले भल्लसे घायल हुए अमर्षशील धृष्टद्युम्नने अत्यन्त कुपित हो दुःशासनपर एक भयंकर बाण चलाया ।।
आपतन्तं महावेगं धृष्टद्युम्नसमीरितम् ।
शरैश्छिच्छेद पुत्रस्ते त्रिभिरेव विशाम्पते ।। २८ ।।
प्रजानाथ! धृष्टद्युम्नके चलाये हुए उस भयंकर वेगशाली बाणको अपनी ओर आते देख आपके पुत्रने तीन ही बाणोंद्वारा उसे काट डाला ।। २८ ।।
अथान्यैः सप्तदशभिर्भल्लैः कनकभूषणैः ।
धृष्टद्युम्नं समासाद्य बाह्वोरुरसि चार्पयत् ।। २९ ।।
तत्पश्चात् धृष्टद्युम्नके पास पहुँचकर उसने सुवर्ण-भूषित दूसरे सत्रह भल्लोंसे उसकी दोनों भुजाओं और छातीमें प्रहार किया ।। २९ ।।
ततः स पार्षदः क्रुद्धो धनुश्छिच्छेद मारिष ।
क्षुरप्रेण सुतीक्ष्णेन तत उच्चुक्रुशुर्जनाः ।। ३० ।।