भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2077

शत्रुसूदन! बलवान् शत्रुके द्वारा अत्यन्त घायल हुए वृषसेनने अपने वैरी नकुलको बीस बाणोंसे बींध डाला। फिर नकुलने भी उसे पाँच बाणोंसे घायल कर दिया ॥ ३८ ॥

ततः शरसहस्रेण तावुभौ पुरुषर्षभौ ।
अन्योन्यमाच्छादयतामथोऽभज्यत वाहिनी ॥ ३९ ॥
तदनन्तर उन दोनों नरश्रेष्ठ वीरोंने सहस्रों बाणोंद्वारा एक-दूसरेको आच्छादित कर दिया। इसी समय कौरव-सेनामें भगदड़ मच गयी ॥ ३९ ॥

स दृष्ट्वा प्रद्रुतां सेनां धार्तराष्ट्रस्य सूतजः ।
निवारयामास बलादनुसृत्य विशाम्पते ॥ ४० ॥
प्रजानाथ! दुर्योधनकी सेनाको भागती देख सूतपुत्र कर्णने बलपूर्वक पीछा करके उसे रोका ॥ ४० ॥

निवृत्ते तु ततः कर्णे नकुलः कौरवान् ययौ ।
कर्णपुत्रस्तु समरे हित्वा नकुलमेव तु ॥ ४१ ॥
जुगोप चक्रं त्वरितो राधेयस्यैव मारिष ।
आर्य! कर्णके लौट जानेपर नकुल कौरवसैनिकोंकी ओर बढ़ चले और कर्णका पुत्र नकुलको छोड़कर समरभूमिमें शीघ्रतापूर्वक राधापुत्र कर्णके पहियोंकी ही रक्षा करने लगा ॥ ४१ ½ ॥

उलूकस्तु रणे क्रुद्धः सहदेवेन वारितः ॥ ४२ ॥
तस्याश्वांश्चतुरो हत्वा सहदेवः प्रतापवान् ।
सारथिं प्रेषयामास यमस्य सदनं प्रति ॥ ४३ ॥
उसी प्रकार रणभूमिमें कुपित हुए उलूकको सहदेवने रोक दिया। प्रतापी सहदेवने उलूकके चारों घोड़ोंको मारकर उसके सारथिको भी यमलोक भेज दिया ॥

उलूकस्तु ततो यानादवप्लुत्य विशाम्पते ।
त्रिगर्तानां बलं तूर्णं जगाम पितृनन्दनः ॥ ४४ ॥
प्रजानाथ! तदनन्तर पिताको आनन्द देनेवाला उलूक उस रथसे कूदकर तुरंत ही त्रिगर्तोंकी सेनामें चला गया ॥

सात्यकिः शकुनिं विद्ध्वा विंशत्या निशितैः शरैः ।
ध्वजं चिच्छेद भल्लेन सौबलस्य हसन्निव ॥ ४५ ॥
सात्यकिने बीस पैने बाणोंसे शकुनिको घायल करके हँसते हुए-से एक भल्लद्वारा सुबलपुत्रके ध्वजको भी काट दिया ॥ ४५ ॥

सौबलस्तस्य समरे क्रुद्धो राजन् प्रतापवान् ।
विदार्य कवचं भूयो ध्वजं चिच्छेद काञ्चनम् ॥ ४६ ॥
राजन्! समरांगणमें कुपित हुए प्रतापी सुबलपुत्रने सात्यकिके कवचको छिन्न-भिन्न करके उनके सुवर्णमय ध्वजको भी काट दिया ॥ ४६ ॥