भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2078

तथैनं निशितैर्बाणैः सात्यकिः प्रत्यविध्यत ।
सारथिं च महाराज त्रिभिरेव समर्पयत् ॥ ४७ ॥
महाराज! इसी प्रकार सात्यकिने भी उसे पैने बाणोंद्वारा घायल कर दिया और उसके सारथिपर भी तीन बाणोंका प्रहार किया ॥ ४७ ॥
अथास्य वाहांस्त्वरितः शरैर्निन्ये यमक्षयम् ।
ततोऽवप्लुत्य सहसा शकुनिर्भरतर्षभ ॥ ४८ ॥
आरुरोह रथं तूर्णमुलूकस्य महात्मनः ।
तत्पश्चात् उन्होंने शीघ्रतापूर्वक बाण मारकर शकुनिके घोड़ोंको यमलोक पहुँचा दिया। भरतश्रेष्ठ! तब शकुनि भी सहसा अपने रथसे कूदकर महामनस्वी उलूकके रथपर तुरंत जा चढ़ा ॥ ४८ १/२ ॥
अपोवाहाथ शीघ्रं स शैनेयाद् युद्धशालिनः ॥ ४९ ॥
सात्यकिस्तु रणे राजंस्तावकानामनीकिनीम् ।
अभिदुद्राव वेगेन ततोऽनीकमभज्यत ॥ ५० ॥
उलूक युद्धमें शोभा पानेवाले सात्यकिके निकटसे अपने रथको शीघ्र दूर हटा ले गया। राजन्! तदनन्तर सात्यकिने रणभूमिमें आपके पुत्रोंकी सेनापर बड़े वेगसे आक्रमण किया। इससे उस सेनामें भगदड़ मच गयी ॥
शैनेयशरसंछन्नं तव सैन्यं विशाम्पते ।
भेजे दश दिशस्तूर्णं न्यपतच्च गतासुवत् ॥ ५१ ॥
प्रजानाथ! सात्यकिके बाणोंसे ढकी हुई आपकी सेना शीघ्र ही दसों दिशाओंकी ओर भाग चली और प्राणहीन-सी होकर पृथ्वीपर गिरने लगी ॥ ५१ ॥
भीमसेनं तव सुतो वारयामास संयुगे ।
तं तु भीमो मुहूर्तेन व्यश्वसूतरथध्वजम् ॥ ५२ ॥
चक्रे लोकेश्वरं तत्र तेनातुष्यन्त वै जनाः ।
आपके पुत्र दुर्योधनने युद्धस्थलमें भीमसेनको रोका। भीमसेनने दो ही घड़ीमें इस जगत्के स्वामी दुर्योधनको घोड़े, सारथि, रथ और ध्वजसे वंचित कर दिया; इससे सब लोग बड़े प्रसन्न हुए ॥ ५२ ॥
ततोऽपायान्नृपस्तत्र भीमसेनस्य गोचरात् ॥ ५३ ॥
कुरुसैन्यं ततः सर्वं भीमसेनमुपाद्रवत् ।
तत्र नादो महानासीद् भीमसेनं जिघांसताम् ॥ ५४ ॥
तब राजा दुर्योधन वहाँ भीमसेनके रास्तेसे दूर हट गया। फिर तो सारी कौरव-सेना भीमसेनपर टूट पड़ी। भीमसेनको मारनेकी इच्छासे आये हुए कौरवोंका महान् सिंहनाद सब ओर गूँज उठा ॥ ५३-५४ ॥
युधामन्युः कृपं विद्ध्वा धनुरस्याशु चिच्छिदे ।

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