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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2079

अथान्यद् धनुरादाय कृपः शस्त्रभृतां वरः ।। ५५ ।।

युधामन्योर्ध्वजं सूतं छत्रं चापातयत् क्षितौ ।

ततोऽपायाद् रथेनैव युधामन्युर्महारथः ।। ५६ ।।

दूसरी ओर युधामन्युने कृपाचार्यको घायल करके तुरंत ही उनके धनुषको काट दिया।

तदनन्तर शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ कृपाचार्यने दूसरा धनुष हाथमें लेकर युधामन्युके ध्वज, सारथि

और छत्रको धराशायी कर दिया। फिर तो महारथी युधामन्यु रथके द्वारा ही वहाँसे पलायन

कर गया ।। ५५-५६ ।।

उत्तमौजाश्च हार्दिक्यं भीमं भीमपराक्रमम् ।

छादयामास सहसा मेघो वृष्ट्येव पर्वतम् ।। ५७ ।।

दूसरी ओर उत्तमौजाने भयंकर पराक्रमी और भयानक रूपवाले कृतवर्माको अपने

बाणोंद्वारा सहसा उसी प्रकार आच्छादित कर दिया, जैसे मेघ जलकी वर्षाद्वारा पर्वतको

ढक देता है ।। ५७ ।।

तद् युद्धमासीत् सुमहद् घोररूपं परंतप ।

यादृशं न मया युद्धं दृष्टपूर्वं विशाम्पते ।। ५८ ।।

परंतप! उन दोनोंका वह महान् युद्ध बड़ा भयंकर था। प्रजानाथ! वैसा युद्ध मैंने पहले

कभी नहीं देखा था ।।

कृतवर्मा ततो राजन्नुत्तमौजसमाहवे ।

हृदि विव्याध सहसा रथोपस्थ उपाविशत् ।। ५९ ।।

राजन्! तदनन्तर कृतवर्माने युद्धस्थलमें सहसा उत्तमौजाकी छातीमें गहरा आघात

किया। उत्तमौजा अचेत-सा होकर रथके पिछले भागमें बैठ गया ।। ५९ ।।

सारथिस्तमपोवाह रथेन रथिनां वरम् ।

कुरुसैन्यं ततः सर्वं भीमसेनमुपाद्रवत् ।। ६० ।।

तब उसका सारथि रथियोंमें श्रेष्ठ उत्तमौजाको रथके द्वारा वहाँसे दूर हटा ले गया। फिर

तो सारी कौरव-सेना भीमसेनपर टूट पड़ी ।। ६० ।।

दुःशासनः सौबलश्च गजानीकेन पाण्डवम् ।

महता परिवार्यैव क्षुद्रकैरभ्यताडयत् ।। ६१ ।।

दुःशासन और शकुनिने विशाल गजसेनाके द्वारा पाण्डुपुत्र भीमसेनको चारों ओरसे

घेरकर उनपर बाणोंका प्रहार आरम्भ कर दिया ।। ६१ ।।

ततो भीमः शरशतैर्दुर्योधनममर्षणम् ।

विमुखीकृत्य तरसा गजानीकमुपाद्रवत् ।। ६२ ।।

उस समय भीमसेनने सैकड़ों बाणोंकी मारसे अमर्षशील दुर्योधनको युद्धसे विमुख

करके हाथियोंकी उस सेनापर वेगपूर्वक आक्रमण किया ।। ६२ ।।

तमापतन्तं सहसा गजानीकं वृकोदरः ।