महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2090, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ें‘इनके मारे जानेपर अर्जुन निश्चय ही हमारे सारे महारथियोंको जीत लेंगे। परंतु अर्जुनके मारे जानेपर धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनकी विजय अवश्यम्भावी है। ध्वजोऽसौ दृश्यते तस्य रोचमानोंऽशुमानिव । एनं जहि महाबाहो किं ते हत्वा युधिष्ठिरम् ॥) ‘महाबाहो! अर्जुनका यह सूर्यके समान प्रकाशमान ध्वज दिखायी देता है। तुम इन्हींको मारो, युधिष्ठिरका वध करनेसे तुम्हारा क्या लाभ है? शङ्खयोर्ध्यायतोः शब्दः सुमहानेष कृष्णयोः ।। २२ ।। श्रूयते चापघोषोऽयं प्रावृषीवाम्बुदस्य ह । ‘श्रीकृष्ण और अर्जुन शंख बजा रहे हैं, जिनका यह महान् शब्द सुनायी पड़ता है। वर्षाकालके मेघकी गर्जनाके समान उनके धनुषका यह गम्भीर घोष कानोंमें पड़ रहा है ।। २२ १/२ ।। असौ निघ्नन् रथोदारानर्जुनः शरवृष्टिभिः ।। २३ ।। सर्वां ग्रसति नः सेनां कर्ण पश्यैनमाहवे । ‘कर्ण! ये अर्जुन अपने बाणोंकी वर्षासे बड़े-बड़े रथियोंका संहार करते हुए हमारी सारी सेनाको कालका ग्रास बना रहे हैं। युद्धस्थलमें इनकी ओर तो देखो ।। २३ १/२ ।। पृष्ठरक्षौ च शूरस्य युधामन्यूत्तमौजसौ ।। २४ ।। उत्तरं चास्य वै शूरश्चक्रं रक्षति सात्यकिः । धृष्टद्युम्नस्तथा चास्य चक्रं रक्षति दक्षिणम् ।। २५ ।। ‘शूरवीर अर्जुनके पृष्ठभागकी रक्षा युधामन्यु और उत्तमौजा कर रहे हैं। शौर्यसम्पन्न सात्यकि उनके उत्तर (बायें) चक्रकी रक्षा करते हैं और धृष्टद्युम्न दाहिने चक्रकी ।। भीमसेनश्च वै राज्ञा धार्तराष्ट्रेण युध्यते । यथा न हन्यातं भीमः सर्वेषां नोऽद्य पश्यताम् ।। २६ ।। तथा राधेय क्रियतां राजा मुच्येत नो यथा । ‘भीमसेन राजा दुर्योधनके साथ युद्ध करते हैं। राधानन्दन! हम सब लोगोंके देखते-देखते आज भीमसेन जिस प्रकार उसे मार न डालें, वैसा प्रयत्न करो। जैसे भी सम्भव हो, हमारे राजाको भीमसेनसे छुटकारा मिलना ही चाहिये ।। २६ १/२ ।। पश्यैनं भीमसेनेन ग्रस्तमाहवशोभिनम् ।। २७ ।। यदि त्वासाद्य मुच्येत विस्मयः सुमहान् भवेत् । ‘देखो, युद्धमें शोभा पानेवाले दुर्योधनको भीमसेनने ग्रस लिया है। यदि तुम्हें पाकर वह संकटसे छूट जाय तो यह महान् आश्चर्यकी घटना होगी ।। २७ १/२ ।। परित्राह्येनमभ्येत्य संशयं परमं गतम् ।। २८ ।। किं नु माद्रीसुतौ हत्वा राजानं च युधिष्ठिरम् ।