महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2091, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ें‘तुम चलकर जीवनके भारी संशयमें पड़े हुए राजा दुर्योधनको बचाओ। आज
माद्रीकुमार नकुल-सहदेव तथा राजा युधिष्ठिरका वध करके क्या होगा?’ ।। २८१/२ ।।
इति शल्यवचः श्रुत्वा राधेयः पृथिवीपते ।। २९ ।।
दृष्ट्वा दुर्योधनं चैव भीमग्रस्तं महाहवे ।
राजगृद्धी भृशं चैव शल्यवाक्यप्रचोदितः ।। ३० ।।
अजातशत्रुमुत्सृज्य माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ।
तव पुत्रं परित्रातुमभ्यधावत वीर्यवान् ।। ३१ ।।
पृथ्वीनाथ! शल्यकी यह बात सुनकर तथा महासमरमें दुर्योधनको भीमसेनसे ग्रस्त
हुआ देखकर शल्यके वचनोंसे प्रेरित हो राजाको अधिक चाहनेवाला पराक्रमी कर्ण
अजातशत्रु युधिष्ठिर और माद्रीकुमार पाण्डुपुत्र नकुल-सहदेवको छोड़कर आपके पुत्रकी
रक्षा करनेके लिये दौड़ा ।। २९–३१ ।।
मद्रराजप्रणुदितैरश्वैराकाशगैरिव ।
गते कर्णे तु कौन्तेयः पाण्डुपुत्रो युधिष्ठिरः ।। ३२ ।।
अपायाज्जवनैरश्वैः सहदेवश्च मारिष ।
माननीय नरेश! मद्रराज शल्यके हाँके हुए घोड़े ऐसे भाग रहे थे, मानो आकाशमें उड़
रहे हों। कर्णके चले जानेपर कुन्तीकुमार पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर और सहदेव तीव्रगामी
घोड़ोंद्वारा वहाँसे भाग गये ।। ३२१/२ ।।
ताभ्यां स सहितस्तूर्णं व्रीडन्निव नरेश्वरः ।। ३३ ।।
प्राप्य सेनानिवेशं च मार्गणैः क्षतविक्षतः ।
अवतीर्णो रथात्तूर्णमाविशच्छयनं शुभम् ।। ३४ ।।
नकुल और सहदेवके साथ वे नरेश लज्जित होते हुए-से तुरंत छावनीमें पहुँचकर रथसे
उतर पड़े और सुन्दर शय्यापर लेट गये। उस समय उनका सारा शरीर बाणोंसे क्षत-विक्षत
हो रहा था ।। ३३-३४ ।।
अपनीतशल्यः सुभृशं हृच्छल्याभिनिपीडितः ।
सोऽब्रवीद्भ्रातरौ राजा माद्रीपुत्रौ महारथौ ।। ३५ ।।
वहाँ उनके शरीरसे बाण निकाल दिये गये तो भी हृदयमें जो अपमानका काँटा गड़
गया था, उससे वे अत्यन्त पीड़ित हो रहे थे। उस समय राजा दोनों भाई माद्रीकुमार
महारथी नकुल-सहदेवसे इस प्रकार बोले— ।। ३५ ।।
(युधिष्ठिर उवाच
गच्छतां त्वरितौ वीरौ यत्र भीमो व्यवस्थितः ।।)
अनीकं भीमसेनस्य पाण्डवावाशु गच्छताम् ।
जीमूत इव नर्दंस्तु युध्यते स वृकोदरः ।। ३६ ।।