भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 2172, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2172

भूरिश्रवा, कृतवर्मा, जयद्रथ, शल्य तथा राजा दुर्योधन-जैसे समस्त महारथियोंपर इस जगत्‌में तुम्हारे सिवा, दूसरा कौन पुरुष विजय पा सकता है? ॥ १३—१५ ॥

श्रेण्यश्च बहुलाः क्षीणाः प्रदीर्णाश्चरथद्विपाः ।
नानाजनपदाश्चोग्राः क्षत्रियाणाममर्षिणाम् ॥ १६ ॥
'अमर्षशील क्षत्रियोंके बहुत-से दल थे, जो बड़े भयंकर और अनेक जनपदोंके निवासी थे, वे सब-के-सब नष्ट हो गये, उनके घोड़े, रथ और हाथी भी धूलमें मिल गये ॥ १६ ॥

गोवास्दासमीयानां वसातीनां च भारत ।
प्राच्यानां वाटधानानां भोजानां चाभिमानिनाम् ॥ १७ ॥
उदीर्णाश्वगजा सेना सर्वक्षत्रस्य भारत ।
त्वां समासाद्य निधनं गता भीमं च भारत ॥ १८ ॥
'भारत! गोवास, दासमीय, वसाति, प्राच्य, वाटधान और भोजदेशनिवासी अभिमानी वीरोंकी तथा सम्पूर्ण क्षत्रियोंकी सेना, जिसमें उद्दण्ड घोड़ों और उन्मत्त हाथियोंकी संख्या अधिक थी, तुम्हारे और भीमसेनके पास पहुँचकर नष्ट हो गयी ॥ १७-१८ ॥

उग्राश्च भीमकर्माणस्तुषारा यवनाः खशाः ।
दार्वाभिसारा दरदाः शका माठरतङ्गणाः ॥ १९ ॥
आन्ध्रकाश्च पुलिन्दाश्च किराताश्चोग्रविक्रमाः ।
म्लेच्छाश्च पर्वतीयाश्च सागरानूपवासिनः ॥ २० ॥
संरम्भिणो युद्धशौण्डा बलिनो दण्डपाणयः ।
एते सुयोधनस्यार्थे संरब्धाः कुरुभिः सह ॥ २१ ॥
न शक्या युधि निर्जेतुं त्वदन्येन परंतप ।
'उग्रस्वभाव, भीषण पराक्रमी एवं भयंकर कर्म करनेवाले तुषार, यवन, खश, दार्वाभिसार, दरद, शक, माठर, तंगण, आन्ध्र, पुलिन्द, किरात, म्लेच्छ, पर्वतीय तथा समुद्रतटवर्ती योद्धा, जो युद्धकुशल, रोषावेशसे युक्त, बलवान् एवं हाथोंमें डंडे लिये हुए हैं, क्रोधमें भरकर कौरव-सैनिकोंके साथ दुर्योधनकी सहायताके लिये आये हैं; शत्रुओंको संताप देनेवाले वीर! तुम्हारे सिवा दूसरा कोई इन्हें नहीं जीत सकता ॥ १९—२१ १/२ ॥

धार्तराष्ट्रमुदग्रं हि व्यूढं दृष्ट्वा महद् बलम् ॥ २२ ॥
यदि त्वं न भवेस्त्राता प्रतीयात् को नु मानवः ।
'यदि तुम रक्षक न होते तो व्यूहाकारमें खड़ी हुई धृतराष्ट्रपुत्रोंकी प्रचण्ड एवं विशाल सेनाको सामने देखकर कौन मनुष्य उसपर चढ़ाई कर सकता था? ॥ २२ १/२ ॥

तत् सागरमिवोद्धूतं रजसा संवृतं बलम् ॥ २३ ॥
विदार्य पाण्डवैः क्रुद्धैस्त्वया गुप्तैर्हतं विभो ।
'प्रभो! तुमसे सुरक्षित रहकर ही क्रोधभरे पाण्डव योद्धाओंने धूलसे आच्छादित और समुद्रके समान उमड़ी हुई कौरव-सेनाको छिन्न-भिन्न करके मार डाला है ॥ २३ १/२ ॥