महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2173, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंमगधानामधिपतिर्जयत्सेनो महाबलः ।। २४ ।। अद्य सप्तैव चाहानि हतः संख्येऽभिमन्युना । ‘अभी सात दिन ही हुए हैं, अभिमन्युने मगधदेशके राजा महाबली जयत्सेनको युद्धमें मार डाला था ।। २४½ ।।
ततो दशसहस्राणि गजानां भीमकर्मणाम् ।। २५ ।। जघान गदया भीमस्तस्य राज्ञः परिच्छदम् । ततोऽन्येऽभिहता नागा रथाश्च शतशो बलात् ।। २६ ।। ‘तत्पश्चात् भीमसेनने राजा जयत्सेनके भयानक कर्म करनेवाले दस हजार हाथियोंको, जो उन्हें सब ओरसे घेरकर खड़े थे, गदाके आघातसे नष्ट कर दिया। तदनन्तर और भी बहुत-से हाथी तथा सैकड़ों रथ उनके द्वारा बलपूर्वक नष्ट किये गये ।। २५-२६ ।।
तदेवं समरे पार्थ वर्तमाने महाभये । भीमसेनं समासाद्य त्वां च पाण्डव कौरवाः ।। २७ ।। सवाजिरथमातङ्गा मृत्युलोकमितो गताः । ‘पाण्डुनन्दन! पार्थ! इस प्रकार महाभयंकर युद्ध आरम्भ होनेपर तुम्हारे और भीमसेनके सामने आकर बहुत-से कौरव-सैनिक घोड़े, रथ और हाथियोंसहित यहाँसे यमलोक पधार गये ।। २७½ ।।
तथा सेनामुखे तत्र निहते पार्थ पाण्डवैः ।। २८ ।। भीष्मः प्रासृजदुग्राणि शरजालानि मारिष । ‘माननीय कुन्तीनन्दन! पाण्डववीरोंने जब वहाँ सेनाके प्रमुख भागका विनाश कर डाला, तब भीष्मजी भयंकर बाणसमूहोंकी वृष्टि करने लगे ।। २८½ ।।
स चेदिकाशिपाञ्चालान् करूषान् मत्स्यकेकयान् ।। २९ ।। शरैः प्रच्छाद्य निधनमनयत् परमास्त्रवित् । ‘वे उत्तम अस्त्रोंके ज्ञाता तो थे ही, उन्होंने पाण्डवपक्षके चेदि, काशी, पांचाल, करूष, मत्स्य और केकयदेशीय योद्धाओंको अपने बाणोंसे आच्छादित करके मौतके मुखमें डाल दिया ।। २९½ ।।
तस्य चापच्युतैर्बाणैः परदेहविदारणैः ।। ३० ।। पूर्णमाकाशमभवद् रुक्मपुङ्खैरजिह्मगैः । ‘उनके धनुषसे छूटे हुए बाण शत्रुओंकी कायाको विदीर्ण कर देनेवाले थे, उनमें सोनेके पंख लगे थे और वे लक्ष्यकी ओर सीधे पहुँचते थे। उन बाणोंसे सम्पूर्ण आकाश भर गया ।। ३०½ ।।
हन्याद् रथसहस्राणि एकैकेनैव मुष्टिना ।। ३१ ।। लक्षं नरद्विपान् हत्वा समेतान् समहाबलान् ।