भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 2183, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2183

सुधर्माणं सात्यकिं च विद्धि कर्णवशं गतान् ॥ १०४ ॥

'अर्जुन! तुम्हें ज्ञात होना चाहिये कि पांचालयोद्धा, द्रौपदीके पुत्र, धृष्टद्युम्न, शिखण्डी,

धृष्टद्युम्नके पुत्रगण, नकुल-कुमार शतानीक, नकुल-सहदेव, दुर्मुख, जनमेजय, सुधर्मा और

सात्यकि—ये सब-के-सब कर्णके वशमें पड़ गये हैं ।।

अभ्याहतानां कर्णेन पञ्चालानामसौ रणे ।

श्रूयते निनदो घोरस्त्वद्वन्धूनां परंतप ॥ १०५ ॥

'शत्रुओंको संताप देनेवाले अर्जुन! देखो, कर्णके द्वारा घायल हुए तुम्हारे बान्धव

पांचालोंका वह घोर आर्तनाद रणभूमिमें स्पष्ट सुनायी दे रहा है ॥ १०५ ॥

न त्वेव भीताः पंचालाः कथंचित् स्युः पराङ्मुखाः ।

न हि मृत्युं महेष्वासा गणयन्ति महारणे ॥ १०६ ॥

'पांचाल योद्धा किसी तरह भयभीत होकर युद्धसे विमुख नहीं हो सकते। वे महाधनुर्धर

वीर महासमरमें मृत्युको कुछ नहीं गिनते हैं ।। १०६ ।।

य एकः पाण्डवीं सेनां शरौघैः समवेष्टयत् ।

तं समासाद्य पञ्चाला भीष्मं नासन् पराङ्मुखाः ॥ १०७ ॥

ते कथं कर्णमासाद्य विद्रवेयुर्महारथाः ।

'जो सारी पाण्डव-सेनाको अकेले ही अपने बाणसमूहोंद्वारा लपेट लेते थे, उन

भीष्मजीका सामना करके भी पांचालयोद्धा कभी युद्धसे मुँह मोड़कर नहीं भागे। वे ही

महारथी वीर कर्णको सामने पाकर कैसे भाग सकते हैं? ।।

यस्त्वेकः सर्वपञ्चालानहन्यहनि नाशयन् ॥ १०८ ॥

कालवच्चरते वीरः पञ्चालानां रथव्रजे ।

तमप्यासाद्य समरे मित्रार्थे मित्रवत्सल ॥ १०९ ॥

तथा ज्वलन्तमस्त्राग्निं गुरुं सर्वधनुष्मताम् ।

निर्दहन्तं च समरे दुर्धर्षं द्रोणमोजसा ॥ ११० ॥

ते नित्यमुदिता जेतुं मृधे शत्रूनरिंदम ।

न जात्वाधिरथेर्भीताः पञ्चालाः स्युः पराङ्मुखाः ॥ १११ ॥

'मित्रवत्सल! जो वीर द्रोणाचार्य प्रतिदिन अकेले ही सम्पूर्ण पांचालोंका विनाश करते

हुए पांचालोंकी रथसेनामें कालके समान विचरते थे, अस्त्रोंकी आगसे प्रज्वलित होते थे,

सम्पूर्ण धनुर्धरोंके गुरु थे और समरांगणमें शत्रुसेनाको दग्ध किये देते थे, अपने बल और

पराक्रमसे दुर्धर्ष उन द्रोणाचार्यको भी संग्राममें सामने पाकर वे पांचाल अपने मित्र

पाण्डवोंके लिये सदा डटकर युद्ध करते रहे। शत्रुदमन अर्जुन! पांचाल सैनिक युद्धमें सदा

शत्रुओंको जीतनेके लिये उद्यत रहते हैं। वे सूतपुत्र कर्णसे भयभीत हो कभी युद्धसे मुँह नहीं

मोड़ सकते ।। १०८-१११ ।।

तेषामापततां शूरः पञ्चालानां तरस्विनाम् ।

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व · पृष्ठ 2183, कुल 3237 में से · BharatKosha