महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2184, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंआदत्तासूञ्शरैः कर्णः पतङ्गानामिवानलः ॥ ११२ ॥
‘जैसे आग अपने पास आये हुए पतंगोंके प्राण ले लेती है, उसी प्रकार शूरवीर कर्ण बाणोंद्वारा अपने ऊपर आक्रमण करनेवाले वेगशाली पांचालोंके प्राण ले रहा है ॥
एते द्रवन्ति पञ्चाला द्राव्यन्ते योधिभिर्ध्रुवम् ।
कर्णेन भरतश्रेष्ठ पश्य पश्य तथाकृतान् ॥ ११३ ॥
‘भरतश्रेष्ठ! देखो, ये पांचालयोद्धा दौड़ रहे हैं। निश्चय ही कर्ण और दूसरे-दूसरे योद्धा उन्हें दौड़ा रहे हैं। देखो, वे कैसी बुरी अवस्थामें पड़ गये हैं? ॥ ११३ ॥
तांस्तथाभिमुखान् वीरान् मित्रार्थे त्यक्तजीवितान् ।
क्षयं नयति राधेयः पञ्चालाञ्छतशो रणे ॥ ११४ ॥
‘जो अपने मित्रके लिये प्राणोंका मोह छोड़कर शत्रुके सामने खड़े होकर जूझ रहे हैं, उन सैकड़ों पांचालवीरोंको कर्ण रणभूमिमें नष्ट कर रहा है ॥ ११४ ॥
तद् भारत महेष्वासानगाधे मज्जतोऽप्लवे ।
कर्णार्णवे प्लवो भूत्वा पञ्चालांस्त्रातुमर्हसि ॥ ११५ ॥
‘भारत! कर्णरूपी अगाध महासागरमें महाधनुर्धर पांचाल बिना नावके डूब रहे हैं। तुम नौका बनकर उनका उद्धार करो ॥ ११५ ॥
अस्त्रं हि रामात् कर्णेन भार्गवादृषिसत्तमात् ।
यदुपात्तं महाघोरं तस्य रूपमुदीर्यते ॥ ११६ ॥
‘कर्णने मुनिश्रेष्ठ भृगुनन्दन परशुरामजीसे जो महाघोर अस्त्र प्राप्त किया है, उसीका रूप इस समय प्रकट हो रहा है ॥ ११६ ॥
तापनं सर्वसैन्यानां घोररूपं सुदारुणम् ।
समावृत्य महासेनां ज्वलन्तं स्वेन तेजसा ॥ ११७ ॥
‘यह अत्यन्त भयंकर एवं घोर भार्गवास्त्र पाण्डवोंकी विशाल सेनाको आच्छादित करके अपने तेजसे प्रज्वलित हो सम्पूर्ण सैनिकोंको संतप्त कर रहा है ॥ ११७ ॥
एते चरन्ति संग्रामे कर्णचापच्युताः शराः ।
भ्रमराणामिव वातास्तापयन्ति स्म तावकान् ॥ ११८ ॥
‘ये संग्राममें कर्णके धनुषसे छूटे हुए बाण भ्रमरोंके समूहोंकी भाँति चलते और तुम्हारे योद्धाओंको संतप्त करते हैं ॥ ११८ ॥
एते द्रवन्ति पञ्चाला दिक्षु सर्वासु भारत ।
कर्णास्त्रं समरे प्राप्य दुर्निवार्यमनात्मभिः ॥ ११९ ॥
‘भरतनन्दन! जिन्होंने अपने मन और इन्द्रियोंको वशमें नहीं कर रखा है, उनके लिये कर्णके अस्त्रको रोकना अत्यन्त कठिन है। समरांगणमें इसकी चोट खाकर ये पांचाल-सैनिक सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग रहे हैं ॥
एष भीमो दृढक्रोधो वृतः पार्थ समन्ततः ।