महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2185, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंसृञ्जयैर्योधयन् कर्णं पीड्यते निशितैः शरैः ॥ १२० ॥ ‘पार्थ! दृढ़तापूर्वक क्रोधको धारण करनेवाले ये भीमसेन सब ओरसे सृंजयोंद्वारा घिरकर कर्णके साथ युद्ध करते हुए उसके पैने बाणोंसे पीड़ित हो रहे हैं ॥ १२० ॥
पाण्डवान् सृञ्जयांश्चैव पञ्चालांश्चैव भारत । हन्यादुपेक्षितः कर्णो रोगो देहमिवागतः ॥ १२१ ॥ ‘भारत! जैसे प्राप्त हुए रोगकी चिकित्सा न की गयी तो वह शरीरको नष्ट कर देता है, उसी प्रकार यदि कर्णकी उपेक्षा की गयी तो वह पाण्डवों, सृंजयों और पांचालोंका भी नाश कर सकता है ॥ १२१ ॥
नान्यं त्वत्तो हि पश्यामि योधं यौधिष्ठिरे बले । यः समासाद्य राधेयं स्वस्तिमानाब्रजेद् गृहम् ॥ १२२ ॥ ‘युधिष्ठिरकी सेनामें मैं तुम्हारे सिवा दूसरे किसी योद्धाको ऐसा नहीं देखता, जो राधापुत्र कर्णका सामना करके कुशलपूर्वक घर लौट सके ॥ १२२ ॥
तमद्य निशितैर्बाणैर्विनिहत्य नरर्षभ । यथाप्रतिज्ञं पार्थ त्वं कृत्वा कीर्तिमवाप्नुहि ॥ १२३ ॥ ‘नरश्रेष्ठ! पार्थ! आज तुम अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार तीखे बाणोंसे कर्णका वध करके उज्ज्वल कीर्ति प्राप्त करो ॥
त्वं हि शक्तो रणे जेतुं सकर्णानपि कौरवान् । नान्यो युधि युधां श्रेष्ठ सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ १२४ ॥ ‘योद्धाओंमें श्रेष्ठ! केवल तुम्हीं संग्राममें कर्णसहित सम्पूर्ण कौरवोंको जीत सकते हो, दूसरा कोई नहीं। यह मैं तुमसे सत्य कहता हूँ ॥ १२४ ॥
एतत् कृत्वा महत् कर्म हत्वा कर्णं महारथम् । कृतार्थः सफलः पार्थ सुखी भव नरोत्तम ॥ १२५ ॥ ‘पुरुषोत्तम पार्थ! अतः महारथी कर्णको मारकर यह महान् कार्य सम्पन्न करनेके पश्चात् तुम कृतकृत्य, सफल-मनोरथ एवं सुखी हो जाओ’ ॥ १२५ ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि श्रीकृष्णवाक्ये त्रिसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें श्रीकृष्णवाक्यविषयक तिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७३ ॥