महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2201, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रीतो भविष्यामि सह त्वयाद्य ।। १४ ।।
‘अच्छा, अब मैं अत्यन्त विश्वस्त होकर शत्रुओंकी प्रचण्ड सेनाका विनाश करूँगा।
यहाँ एकत्र हुई इस सेनाको युद्धस्थलमें नष्ट करके मैं तुम्हारे साथ ही आज प्रसन्नताका
अनुभव करूँगा ।। १४ ।।
सर्वांस्तूनान् सायकानामवेक्ष्य
किं शिष्टं स्यात् सायकानां रथे मे ।
का वा जातिः किं प्रमाणं च तेषां
ज्ञात्वा व्यक्तं तत् समाचक्ष्व सूत ।। १५ ।।
(कति वा सहस्राणि कति वा शतानि
ह्याचक्ष्व मे सारथे क्षिप्रमेव ।।
‘सूत! तुम मेरे रथपर रखे हुए बाणोंके सारे तरकसोंकी देख-भाल करके ठीक-ठीक
समझकर मुझे स्पष्टरूपसे बताओ कि अब उनमें कितने बाण अवशिष्ट रह गये हैं? किस-
किस जातिके बाण बचे हैं और उनकी संख्या कितनी है? सारथे! शीघ्र बताओ, कौन बाण
कितने हजार और कितने सौ शेष हैं?’ ।। १५ ।।
विशोक उवाच
सर्वं विदित्वैवमहं वदामि
तवार्थसिद्धिप्रदमद्य वीर ।।
कैकेयकाम्बोजसुराष्ट्रबाह्लिका
म्लेच्छाश्च सुह्माः परतङ्गणाश्च ।
मद्राश्च वङ्गा मगधाः कुलिन्दा
आनर्तकावर्तकाः पर्वतीयाः ।।
सर्वे गृहीतप्रवरायुधास्त्वां
संख्ये समावेष्ट्य ततो विनेदुः ।।)
विशोकने कहा—वीर! मैं आज सब कुछ पता लगाकर आपके मनोरथकी सिद्धि
करनेवाली बात बता रहा हूँ, कैकेय, काम्बोज, सौराष्ट्र, बाह्लिक, म्लेच्छ, सुह्म, परतंगण,
मद्र, वंग, मगध, कुलिन्द, आनर्त, आवर्त और पर्वतीय सभी योद्धा हाथोंमें श्रेष्ठ आयुध लिये
आपको चारों ओरसे घेरकर युद्धस्थलमें शत्रुओंका सामना करनेके लिये गरज रहे हैं।
षण्मार्गणानामयुतानि वीर
क्षुराश्च भल्लाश्च तथायुताख्याः ।
नाराचानां द्वे सहस्रे च वीर
त्रीण्येव च प्रदराणां स्म पार्थ ।। १६ ।।