भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2223

अपूजयन् महेष्वासा धार्तराष्ट्रा नरोत्तमम् ।। ३२ ।। कर्णं रथवरश्रेष्ठं श्रेष्ठं सर्वधनुष्मताम् । धृतराष्ट्रके महाधनुर्धर पुत्र सम्पूर्ण धनुर्धरों तथा रथियोंमें श्रेष्ठ नरोत्तम कर्णकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे ।।

ततः कर्णो महाराज ददाह रिपुवाहिनीम् ।। ३३ ।। कक्षमिद्धो यथा वह्निर्निदाघे ज्वलितो महान् । महाराज! जैसे ग्रीष्म-ऋतुमें अत्यन्त प्रज्वलित हुई आग सूखे काठ एवं घास-फूसको जला देती है, उसी प्रकार कर्ण शत्रुसेनाको दग्ध करने लगा ।। ३३ १/२ ।।

ते वध्यमानाः कर्णेन पाण्डवेयास्ततस्ततः ।। ३४ ।। प्राद्रवन्त रणे भीताः कर्णं दृष्ट्वा महारथम् । कर्णके द्वारा मारे जाते हुए पाण्डवसैनिक रणभूमिमें उस महारथी वीरको देखते ही भयभीत हो जहाँ-तहाँसे भागने लगे ।। ३४ १/२ ।।

तत्राक्रन्दो महानासीत् पञ्चालानां महारणे ।। ३५ ।। वध्यतां सायकैस्तीक्ष्णैः कर्णचापवरच्युतैः । कर्णके धनुषसे छूटे हुए तीखे बाणोंद्वारा मारे जानेवाले पांचालोंका महान् आर्तनाद उस महासमरमें गूँजने लगा ।।

तेन शब्देन वित्रस्ता पाण्डवानां महाचमूः ।। ३६ ।। कर्णमेकं रणे योधं मेनिरे तत्र शात्रवाः । उस घोर शब्दसे पाण्डवोंकी विशाल सेना भयभीत हो उठी। शत्रुओंके सभी सैनिक रणभूमिमें एकमात्र कर्णको ही सर्वश्रेष्ठ योद्धा मानने लगे ।। ३६ १/२ ।।

तत्राद्भुतं पुनश्चक्रे राधेयः शत्रुकर्शनः ।। ३७ ।। यदेनं पाण्डवाः सर्वे न शेकुरभिवीक्षितुम् । शत्रुसूदन राधापुत्रने पुनः वहाँ अद्भुत पराक्रम प्रकट किया, जिससे समस्त पाण्डव-योद्धा उसकी ओर आँख उठाकर देख भी नहीं सके ।। ३७ १/२ ।।

यथौघः पर्वतश्रेष्ठमासाद्याभिप्रदीर्यते ।। ३८ ।। तथा तत् पाण्डवं सैन्यं कर्णमासाद्य दीर्यते । जैसे जलका महान् प्रवाह किसी ऊँचे पर्वतसे टकराकर कई धाराओंमें बँट जाता है, उसी प्रकार पाण्डवसेना कर्णके पास पहुँचकर तितर-बितर हो जाती थी ।। ३८ १/२ ।।

कर्णोऽपि समरे राजन् विधूमोऽग्निरिव ज्वलन् ।। ३९ ।। दहंस्तस्थौ महाबाहुः पाण्डवानां महाचमूम् । राजन्! समरांगणमें धूमरहित अग्निके समान प्रज्वलित होनेवाला महाबाहु कर्ण भी पाण्डवोंकी विशाल सेनाको दग्ध करता हुआ स्थिरभावसे खड़ा रहा ।। ३९ १/२ ।।