महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2224, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंशिरांसि च महाराज कर्णांश्चैव सकुण्डलान् ॥ ४० ॥ बाहूंश्च वीरो वीराणां चिच्छेद लघु चेषुभिः । महाराज! वीर कर्णने बाणोंद्वारा पाण्डव-पक्षके वीरोंके मस्तक, कुण्डलसहित कान तथा भुजाएँ शीघ्रता-पूर्वक काट डालीं ॥ ४० १/२ ॥ हस्तिदन्तत्सरून् खड्गान् ध्वजान् शक्तीर्हयान् गजान् ॥ ४१ ॥ रथांश्च विविधान् राजन् पताका व्यजनानि च । अक्षं च युगयोक्त्राणि चक्राणि विविधानि च ॥ ४२ ॥ चिच्छेद बहुधा कर्णो योधव्रतमनुष्ठितः । राजन्! योद्धाओंके व्रतका पालन करनेवाले कर्णने हाथीदाँतकी बनी हुई मूठवाले खड्गों, ध्वजों, शक्तियों, घोड़ों, हाथियों, नाना प्रकारके रथों, पताकाओं, व्यजनों, धुरों, जूओं, जोतों और भाँति-भाँतिके पहियोंके टुकड़े-टुकड़े कर डाले ॥ ४१-४२ १/२ ॥ तत्र भारत कर्णेन निहतैर्गजवाजिभिः ॥ ४३ ॥ अगम्यरूपा पृथिवी मांसशोणितकर्दमा । भारत! वहाँ कर्णद्वारा मारे गये हाथियों और घोड़ोंकी लाशोंसे पृथ्वीपर चलना असम्भव हो गया। रक्त और मांसकी कीच जम गयी ॥ ४३ १/२ ॥ विषमं च समं चैव हतैरश्वपदातिभिः ॥ ४४ ॥ रथैश्च कुञ्जरैश्चैव न प्राज्ञायत किञ्चन । मरे हुए घोड़ों, पैदलों, रथों और हाथियोंसे पट जानेके कारण वहाँकी ऊँची-नीची भूमिका कुछ पता नहीं लगता था ॥ नापि स्वे न परे योधाः प्राज्ञायन्त परस्परम् ॥ ४५ ॥ घोरे शरान्धकारे तु कर्णास्त्रे च विजृम्भिते । कर्णका अस्त्र जब वेगपूर्वक बढ़ने लगा तो वहाँ बाणोंसे घोर अन्धकार छा गया। उसमें अपने और शत्रुपक्षके योद्धा परस्पर पहचाने नहीं जाते थे ॥ ४५ १/२ ॥ राधेयचापनिर्मुक्तैः शरैः काञ्चनभूषणैः ॥ ४६ ॥ संछादिता महाराज पाण्डवानां महारथाः । महाराज! राधापुत्रके धनुषसे छूटे हुए सुवर्णभूषित बाणोंद्वारा समस्त पाण्डव महारथी आच्छादित हो गये ॥ ते पाण्डवेयाः समरे राधेयेन पुनः पुनः ॥ ४७ ॥ अभज्यन्त महाराज यतमाना महारथाः । महाराज! समरभूमिमें प्रयत्नपूर्वक युद्ध करनेवाले पाण्डवपक्षके महारथी राधापुत्र कर्णके द्वारा बारंबार भागनेको विवश कर दिये जाते थे ॥ ४७ १/२ ॥ मृगसङ्घान् यथा क्रुद्धः सिंहो द्रावयते वने ॥ ४८ ॥