महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 224, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंचले ॥ ६ ॥ विधमेदभ्रजालानि यथा वायुः समुद्धतः । व्यधमत् तान्यनीकानि तथैव पवनात्मजः ॥ ७ ॥ जैसे जोरसे उठी हुई वायु मेघोंकी घटाको छिन्न-भिन्न कर डालती है, उसी प्रकार पवनपुत्र भीमसेनने उन समस्त गजसेनाओंको तहस-नहस कर डाला ॥
स तेषु विसृजन् बाणान् भीमो नागेश्वशोभत । भुवनेष्विव सर्वेषु गभस्तीनुदितो रविः ॥ ८ ॥ जैसे उदित हुए सूर्य समस्त भुवनोंमें अपनी किरणोंका विस्तार करते हैं, उसी प्रकार भीमसेन उन हाथियोंपर बाणोंकी वर्षा करते हुए शोभा पा रहे थे ॥
ते भीमबाणाभिहताः संस्यूता विबभुर्गजाः । गभस्तिभिरिवार्कस्य व्योम्नि नानाबलाहकाः ॥ ९ ॥ वे भीमके बाणोंसे मारे जाकर परस्पर सटे हुए हाथी आकाशमें सूर्यकी किरणोंसे गुँथे हुए नाना प्रकारके मेघोंकी भाँति शोभा पा रहे थे ॥ ९ ॥
तथा गजानां कदनं कुर्वाणमनिलात्मजम् । क्रुद्धो दुर्योधनोऽभ्येत्य प्रत्यविध्यच्छितैः शरैः ॥ १० ॥ इस प्रकार गजसेनाका संहार करते हुए पवनपुत्र भीमसेनके पास आकर क्रोधमें भरे हुए दुर्योधनने उन्हें पैने बाणोंसे बींध डाला ॥ १० ॥
ततः क्षणेन क्षितिपं क्षतजप्रतिमेक्षणः । क्षयं निनीषुर्निशितैर्भीमो विव्याध पत्रिभिः ॥ ११ ॥