भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 225

यह देख भीमसेनकी आँखें खूनके समान लाल हो गयीं। उन्होंने क्षणभरमें राजा दुर्योधनका नाश करनेकी इच्छासे पंखयुक्त पैने बाणोंद्वारा उसे बींध डाला ॥ ११ ॥

स शराचितसर्वाङ्गः क्रुद्धो विव्याध पाण्डवम् ।
नाराचैरर्करश्म्याभैर्भीमसेनं स्मयन्निव ॥ १२ ॥

दुर्योधनके सारे अंग बाणोंसे व्याप्त हो गये थे। अतः उसने कुपित होकर सूर्यकी किरणोंके समान तेजस्वी नाराचोंद्वारा पाण्डुनन्दन भीमसेनको मुसकराते हुए-से घायल कर दिया ॥ १२ ॥

तस्य नागं मणिमयं रत्नचित्रध्वजे स्थितम् ।
भल्लाभ्यां कार्मुकं चैव क्षिप्रं चिच्छेद पाण्डवः ॥ १३ ॥

राजन्! उसके रत्ननिर्मित विचित्र ध्वजके ऊपर मणिमय नाग विराजमान था। उसे पाण्डुनन्दन भीमने शीघ्र ही दो भल्लोंसे काट गिराया और उसके धनुषके भी टुकड़े-टुकड़े कर दिये ॥ १३ ॥

दुर्योधनं पीड्यमानं दृष्ट्वा भीमेन मारिष ।
चुक्षोभयिषुरभ्यागादङ्गो मातङ्गमास्थितः ॥ १४ ॥

आर्य! भीमसेनके द्वारा दुर्योधनको पीड़ित होते देख क्षोभमें डालनेकी इच्छासे मतवाले हाथीपर बैठे हुए राजा अंग उनका सामना करनेके लिये आ गये ॥ १४ ॥

तमापतन्तं नागेन्द्रमम्बुदप्रतिमस्वनम् ।
कुम्भान्तरे भीमसेनो नाराचैरार्दयद् भृशम् ॥ १५ ॥

वह गजराज मेघके समान गर्जना करनेवाला था। उसे अपनी ओर आते देख भीमसेनने उसके कुम्भस्थलमें नाराचोंद्वारा बड़ी चोट पहुँचायी ॥ १५ ॥

तस्य कायं विनिर्भिद्य
न्यमज्जद् धरणीतले ।
ततः पपात द्विरदो
वज्राहत इवाचलः ॥ १६ ॥

भीमसेनका नाराच उस हाथीके शरीरको विदीर्ण करके धरतीमें समा गया, इससे वह गजराज वज्रके मारे हुए पर्वतकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ १६ ॥

तस्यावर्जितनागस्य
म्लेच्छस्याधः पतिष्यतः ।
शिरश्चिच्छेद भल्लेन
क्षिप्रकारी वृकोदरः ॥ १७ ॥

वह म्लेच्छजातीय अंग हाथीसे अलग नहीं हुआ था। उस हाथीके साथ-साथ वह नीचे गिरना ही चाहता था कि शीघ्रकारी भीमसेनने एक भल्लके द्वारा उसका सिर काट दिया ॥ १७ ॥