भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2257

गाण्डीवधारी अर्जुनके द्वारा परास्त हुए कौरव-योद्धा समरांगणमें उनकी बाण-वर्षाको अपने लिये असह्य मानकर युद्धसे पीछे हटने लगे ॥ ४४ ॥ ते हित्वा समरे कर्णं वध्यमानाश्च सायकैः । प्रदुद्रुवुर्दिशो भीताश्चक्रुशुश्चापि सूतजम् ॥ ४५ ॥ बाणोंसे बिंध जानेके कारण वे भयभीत हो रणभूमिमें कर्णको अकेला ही छोड़कर सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग चले; किंतु अपनी रक्षाके लिये सूतपुत्र कर्णको ही पुकारते रहे ॥ ४५ ॥ अभ्यद्रवत तान् पार्थः किरन् शरशतान् बहून् । हर्षयन् पाण्डवान् योधान् भीमसेनपुरोगमान् ॥ ४६ ॥ कुन्तीकुमार अर्जुन सैकड़ों बाणोंकी वर्षा करते और भीमसेन आदि पाण्डव-योद्धाओंका हर्ष बढ़ाते हुए आपके उन सैनिकोंको खदेड़ने लगे ॥ ४६ ॥ पुत्रास्तु ते महाराज जग्मुः कर्णरथं प्रति । अगाधे मज्जतां तेषां द्वीपः कर्णोऽभवत्तदा ॥ ४७ ॥ महाराज! इसके बाद आपके पुत्र भागकर कर्णके रथके पास गये। वे संकटके अगाध समुद्रमें डूब रहे थे। उस समय कर्ण ही द्वीपके समान उनका रक्षक हुआ ॥ ४७ ॥ कुरवो हि महाराज निर्विषाः पन्नगा इव । कर्णमेवोपलीयन्त भयाद् गाण्डीवधन्वनः ॥ ४८ ॥ महाराज! कौरव विषरहित सर्पोंके समान गाण्डीवधारी अर्जुनके भयसे कर्णके ही पास छिपने लगे ॥ ४८ ॥ यथा सर्वाणि भूतानि मृत्योर्भीतानि मारिष । धर्ममेवोपलीयन्ते कर्मवन्ति हि यानि च ॥ ४९ ॥ तथा कर्णं महेष्वासं पुत्रास्तव नराधिप । उपालीयन्त संत्रासात् पाण्डवस्य महात्मनः ॥ ५० ॥ माननीय नरेश! जैसे कर्म करनेवाले सब जीव मृत्युसे डरकर धर्मकी ही शरण लेते हैं, उसी प्रकार आपके पुत्र महामना पाण्डुपुत्र अर्जुनके भयसे महाधनुर्धर कर्णकी ही ओटमें छिपने लगे थे ॥ ४९-५० ॥ तान् शोणितपरिक्लिन्नान् विषमस्थान् शरातुरान् । मा भैष्टेत्यब्रवीत् कर्णो ह्यभीतो मामितेति च ॥ ५१ ॥ कर्णने उन्हें खूनसे लथपथ, संकटमें मग्न और बाणोंकी चोटसे व्याकुल देखकर कहा—‘वीरो! डरो मत। तुम सब लोग निर्भय होकर मेरे पास आ जाओ' ॥ ५१ ॥ सम्भग्नं हि बलं दृष्ट्वा बलात् पार्थेन तावकम् । धनुर्विस्फारयन् कर्णस्तस्थौ शत्रुजिघांसया ॥ ५२ ॥