महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2256, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंशरव्रातैश्चिता रेजुः कदम्बा इव केसरैः ॥ ३८ ॥
युद्धस्थलमें गाण्डीवधारी अर्जुनके बाणोंसे छिदे हुए मनुष्य, घोड़े, रथ और हाथी केसरयुक्त कदम्बपुष्पोंके समान सुशोभित हो रहे थे ॥ ३८ ॥
ततः कुरूणामभवदार्तनादो महान् नृप ।
नराश्वनागासुहरैर्वध्यतामर्जुनेषुभिः ॥ ३९ ॥
नरेश्वर! तदनन्तर मनुष्यों, घोड़ों और हाथियोंके प्राण लेनेवाले अर्जुनके बाणोंद्वारा हताहत होते हुए कौरवोंका महान् आर्तनाद प्रकट होने लगा ॥ ३९ ॥
हाहाकृतं भृशं त्रस्तं लीयमानं परस्परम् ।
अलातचक्रवत् सैन्यं तदाभ्रमत तावकम् ॥ ४० ॥
महाराज! उस समय अत्यन्त भयभीत हो हाहाकार मचाती और एक-दूसरेकी आड़में छिपती हुई आपकी सेना अलातचक्रके समान वहाँ चक्कर काटने लगी ॥ ४० ॥
ततस्तद् युद्धमभवत् कुरूणां सुमहद् बलैः ।
न ह्यत्रासीदनिर्भिन्नो रथः सादी हयो गजः ॥ ४१ ॥
तत्पश्चात् कौरवोंकी सेनाके साथ महान् युद्ध होने लगा। उसमें कोई भी ऐसा रथ, सवार, घोड़ा अथवा हाथी नहीं था, जो अर्जुनके बाणोंसे विदीर्ण न हो गया हो ॥ ४१ ॥
आदीप्तमिव तत् सैन्यं शरैश्छिन्नतनुच्छदम् ।
आसीत् सुशोणितक्लिन्नं फुल्लाशोकवनं यथा ॥ ४२ ॥
उस समय सारी सेना जलती हुई-सी दिखायी देती थी। बाणोंसे उसके कवच छिन्न-भिन्न हो गये थे तथा वह खूनसे लथपथ हो खिले हुए अशोकवनके समान प्रतीत होती थी ॥ ४२ ॥
(तत् सैन्यं भरतश्रेष्ठ वध्यमानं शितैः शरैः ।
न जहौ समरं प्राप्य फाल्गुनं शत्रुतापनम् ॥
तत्राद्भुतमपश्याम कौरवाणां पराक्रमम् ।
वध्यमानापि यत् पार्थं न जहुर्भरतर्षभ ॥)
भरतश्रेष्ठ! शत्रुओंको तपानेवाले अर्जुनको सामने पाकर तीखे बाणोंसे मारी जाती हुई आपकी उस सेनाने युद्ध नहीं छोड़ा। भरतभूषण! वहाँ हमलोगोंने कौरवयोध्दाओंका यह अद्भुत पराक्रम देखा कि वे मारे जानेपर भी अर्जुनको छोड़ नहीं रहे थे।
तं दृष्ट्वा कुरवस्तत्र विक्रान्तं सव्यसाचिनम् ।
निराशाः समपद्यन्त सर्वे कर्णस्य जीविते ॥ ४३ ॥
सव्यसाची अर्जुनको इस प्रकार पराक्रम प्रकट करते देख समस्त कौरव-सैनिक कर्णके जीवनसे निराश हो गये ॥ ४३ ॥
अविषह्यं तु पार्थस्य शरसम्पातमाहवे ।
मत्वा न्यवर्तन् कुरवो जिता गाण्डीवधन्वना ॥ ४४ ॥