महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
शरव्रातैश्चिता रेजुः कदम्बा इव केसरैः ॥ ३८ ॥
युद्धस्थलमें गाण्डीवधारी अर्जुनके बाणोंसे छिदे हुए मनुष्य, घोड़े, रथ और हाथी केसरयुक्त कदम्बपुष्पोंके समान सुशोभित हो रहे थे ॥ ३८ ॥
ततः कुरूणामभवदार्तनादो महान् नृप ।
नराश्वनागासुहरैर्वध्यतामर्जुनेषुभिः ॥ ३९ ॥
नरेश्वर! तदनन्तर मनुष्यों, घोड़ों और हाथियोंके प्राण लेनेवाले अर्जुनके बाणोंद्वारा हताहत होते हुए कौरवोंका महान् आर्तनाद प्रकट होने लगा ॥ ३९ ॥
हाहाकृतं भृशं त्रस्तं लीयमानं परस्परम् ।
अलातचक्रवत् सैन्यं तदाभ्रमत तावकम् ॥ ४० ॥
महाराज! उस समय अत्यन्त भयभीत हो हाहाकार मचाती और एक-दूसरेकी आड़में छिपती हुई आपकी सेना अलातचक्रके समान वहाँ चक्कर काटने लगी ॥ ४० ॥
ततस्तद् युद्धमभवत् कुरूणां सुमहद् बलैः ।
न ह्यत्रासीदनिर्भिन्नो रथः सादी हयो गजः ॥ ४१ ॥
तत्पश्चात् कौरवोंकी सेनाके साथ महान् युद्ध होने लगा। उसमें कोई भी ऐसा रथ, सवार, घोड़ा अथवा हाथी नहीं था, जो अर्जुनके बाणोंसे विदीर्ण न हो गया हो ॥ ४१ ॥
आदीप्तमिव तत् सैन्यं शरैश्छिन्नतनुच्छदम् ।
आसीत् सुशोणितक्लिन्नं फुल्लाशोकवनं यथा ॥ ४२ ॥
उस समय सारी सेना जलती हुई-सी दिखायी देती थी। बाणोंसे उसके कवच छिन्न-भिन्न हो गये थे तथा वह खूनसे लथपथ हो खिले हुए अशोकवनके समान प्रतीत होती थी ॥ ४२ ॥
(तत् सैन्यं भरतश्रेष्ठ वध्यमानं शितैः शरैः ।
न जहौ समरं प्राप्य फाल्गुनं शत्रुतापनम् ॥
तत्राद्भुतमपश्याम कौरवाणां पराक्रमम् ।
वध्यमानापि यत् पार्थं न जहुर्भरतर्षभ ॥)
भरतश्रेष्ठ! शत्रुओंको तपानेवाले अर्जुनको सामने पाकर तीखे बाणोंसे मारी जाती हुई आपकी उस सेनाने युद्ध नहीं छोड़ा। भरतभूषण! वहाँ हमलोगोंने कौरवयोध्दाओंका यह अद्भुत पराक्रम देखा कि वे मारे जानेपर भी अर्जुनको छोड़ नहीं रहे थे।
तं दृष्ट्वा कुरवस्तत्र विक्रान्तं सव्यसाचिनम् ।
निराशाः समपद्यन्त सर्वे कर्णस्य जीविते ॥ ४३ ॥
सव्यसाची अर्जुनको इस प्रकार पराक्रम प्रकट करते देख समस्त कौरव-सैनिक कर्णके जीवनसे निराश हो गये ॥ ४३ ॥
अविषह्यं तु पार्थस्य शरसम्पातमाहवे ।
मत्वा न्यवर्तन् कुरवो जिता गाण्डीवधन्वना ॥ ४४ ॥
गाण्डीवधारी अर्जुनके द्वारा परास्त हुए कौरव-योद्धा समरांगणमें उनकी बाण-वर्षाको अपने लिये असह्य मानकर युद्धसे पीछे हटने लगे ॥ ४४ ॥ ते हित्वा समरे कर्णं वध्यमानाश्च सायकैः । प्रदुद्रुवुर्दिशो भीताश्चक्रुशुश्चापि सूतजम् ॥ ४५ ॥ बाणोंसे बिंध जानेके कारण वे भयभीत हो रणभूमिमें कर्णको अकेला ही छोड़कर सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग चले; किंतु अपनी रक्षाके लिये सूतपुत्र कर्णको ही पुकारते रहे ॥ ४५ ॥ अभ्यद्रवत तान् पार्थः किरन् शरशतान् बहून् । हर्षयन् पाण्डवान् योधान् भीमसेनपुरोगमान् ॥ ४६ ॥ कुन्तीकुमार अर्जुन सैकड़ों बाणोंकी वर्षा करते और भीमसेन आदि पाण्डव-योद्धाओंका हर्ष बढ़ाते हुए आपके उन सैनिकोंको खदेड़ने लगे ॥ ४६ ॥ पुत्रास्तु ते महाराज जग्मुः कर्णरथं प्रति । अगाधे मज्जतां तेषां द्वीपः कर्णोऽभवत्तदा ॥ ४७ ॥ महाराज! इसके बाद आपके पुत्र भागकर कर्णके रथके पास गये। वे संकटके अगाध समुद्रमें डूब रहे थे। उस समय कर्ण ही द्वीपके समान उनका रक्षक हुआ ॥ ४७ ॥ कुरवो हि महाराज निर्विषाः पन्नगा इव । कर्णमेवोपलीयन्त भयाद् गाण्डीवधन्वनः ॥ ४८ ॥ महाराज! कौरव विषरहित सर्पोंके समान गाण्डीवधारी अर्जुनके भयसे कर्णके ही पास छिपने लगे ॥ ४८ ॥ यथा सर्वाणि भूतानि मृत्योर्भीतानि मारिष । धर्ममेवोपलीयन्ते कर्मवन्ति हि यानि च ॥ ४९ ॥ तथा कर्णं महेष्वासं पुत्रास्तव नराधिप । उपालीयन्त संत्रासात् पाण्डवस्य महात्मनः ॥ ५० ॥ माननीय नरेश! जैसे कर्म करनेवाले सब जीव मृत्युसे डरकर धर्मकी ही शरण लेते हैं, उसी प्रकार आपके पुत्र महामना पाण्डुपुत्र अर्जुनके भयसे महाधनुर्धर कर्णकी ही ओटमें छिपने लगे थे ॥ ४९-५० ॥ तान् शोणितपरिक्लिन्नान् विषमस्थान् शरातुरान् । मा भैष्टेत्यब्रवीत् कर्णो ह्यभीतो मामितेति च ॥ ५१ ॥ कर्णने उन्हें खूनसे लथपथ, संकटमें मग्न और बाणोंकी चोटसे व्याकुल देखकर कहा—‘वीरो! डरो मत। तुम सब लोग निर्भय होकर मेरे पास आ जाओ' ॥ ५१ ॥ सम्भग्नं हि बलं दृष्ट्वा बलात् पार्थेन तावकम् । धनुर्विस्फारयन् कर्णस्तस्थौ शत्रुजिघांसया ॥ ५२ ॥
अर्जुनने बलपूर्वक आपकी सेनाको भगा दिया है—यह देखकर कर्ण शत्रुओंका वध करनेकी इच्छासे धनुष तानकर खड़ा हो गया ।। ५२ ।।
तान् प्रद्रुतान् कुरून् दृष्ट्वा कर्णः शस्त्रभृतां वरः ।
संचिन्त्ययित्वा पार्थस्य वधे दध्रे मनःश्वसन् ।। ५३ ।।
शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ कर्णने कौरव-सैनिकोंको भागते देख खूब सोच-विचारकर लंबी साँस लेते हुए मन-ही-मन अर्जुनके वधका निश्चय किया ।। ५३ ।।
विस्फार्य सुमहच्चापं ततश्चाधिरथिर्वृषः ।
पञ्चालान् पुनराधावत् पश्यतः सव्यसाचिनः ।। ५४ ।।
तत्पश्चात् धर्मात्मा अधिरथपुत्र कर्णने अपने विशाल धनुषको फैलाकर अर्जुनके देखते-देखते पुनः पांचाल-योद्धाओंपर धावा किया ।। ५४ ।।
ततः क्षणेन क्षितिपाः क्षतजप्रतिमेक्षणाः ।
कर्णं ववर्षुर्बाणौघैर्यथा मेघा महीधरम् ।। ५५ ।।
यह देख पांचालनरेशोंके नेत्र रोषसे लाल हो गये। जैसे बादल पर्वतपर पानी बरसाते हैं, उसी प्रकार वे क्षणभरमें कर्णपर बाणसमूहोंकी वर्षा करने लगे ।। ५५ ।।
ततः शरसहस्राणि कर्णमुक्तानि मारिष ।
व्ययोजयन्त पञ्चालान् प्राणैः प्राणभृतां वर ।। ५६ ।।
प्राणधारियोंमें श्रेष्ठ मान्यवर नरेश! तदनन्तर कर्णके छोड़े हुए सहस्रों बाण पांचालोंको प्राणहीन करने लगे ।। ५६ ।।
तत्र शब्दो महानासीत् पञ्चालानां महामते ।
वध्यतां सूतपुत्रेण मित्रार्थे मित्रगृद्धिना ।। ५७ ।।
महामते! वहाँ मित्रका हित चाहनेवाले सूतपुत्र कर्णके द्वारा मित्रकी ही भलाईके लिये मारे जानेवाले पांचालोंका महान् आर्तनाद होने लगा ।। ५७ ।।
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संकुलयुद्धे एकाशीतितमोऽध्यायः ।। ८१ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें संकुलयुद्धविषयक इक्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ८१ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ श्लोक मिलाकर कुल ६० श्लोक हैं।)
अध्याय (पृष्ठ 2259)
द्व्यशीतितमोऽध्यायः
सात्यकिके द्वारा कर्णपुत्र प्रसेनका वध, कर्णका पराक्रम और दुःशासन एवं भीमसेनका युद्ध
संजय उवाच
ततः कर्णः कुरुषु प्रद्रुतेषु
वरूथिना श्वेतहयेन राजन् ।
पाञ्चालपुत्रान् व्यधमत् सूतपुत्रो
महेषुभिर्वात इवाभ्रसंघान् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! जब कौरव-सैनिक बड़े वेगसे भागने लगे, उस समय जैसे वायु मेघोंके समूहको छिन्न-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार सूतपुत्र कर्णने श्वेत घोड़ोंवाले रथके द्वारा आक्रमण करके अपने विशाल बाणोंसे पांचालराजकुमारोंका संहार आरम्भ किया ॥ १ ॥
सूतं रथादञ्जलिकैर्निपात्य
जघान चाश्वाञ्जनमेजयस्य ।
शतानीकं सुतसोमं च भल्लै-
रवाकिरद् धनुषी चाप्यकृन्तत् ॥ २ ॥
उसने अंजलिक नामवाले बाणोंसे जनमेजयके सारथिको रथसे नीचे गिराकर उसके घोड़ोंको भी मार डाला। फिर शतानीक तथा सुतसोमको भल्लोंसे ढक दिया और उन दोनोंके धनुष भी काट डाले ॥ २ ॥
धृष्टद्युम्नं निर्बिभेदाथ षड्भि-
र्जघानाश्वांस्तरसा तस्य संख्ये ।
हत्वा चाश्वान् सात्यकेः सूतपुत्रः
कैकेयपुत्रं न्यवधीद् विशोकम् ॥ ३ ॥
तत्पश्चात् छः बाणोंसे युद्धस्थलमें धृष्टद्युम्नको घायल कर दिया और उनके घोड़ोंको भी वेगपूर्वक मार डाला। इसके बाद सूतपुत्रने सात्यकिके घोड़ोंको नष्ट करके केकयराजकुमार विशोकका भी वध कर डाला ॥ ३ ॥
तमभ्यधावन्निहते कुमारे
कैकेयसेनापतिरुग्रकर्मा ।
शरैर्विधुन्वन् भृशमुग्रवेगैः
कर्णात्मजं चाप्यहनत् प्रसेनम् ॥ ४ ॥
केकयराजकुमारके मारे जानेपर वहाँके सेनापति उग्रकर्माने कर्णपर धावा किया। उसने धनुषको तीव्रवेगसे संचालित करते हुए भयंकर वेगवाले बाणोंद्वारा कर्णके पुत्र प्रसेनको भी घायल कर दिया॥ ४॥
तस्यार्धचन्द्रैस्त्रिभिरुच्चकर्त प्रहस्य बाहू च शिरश्च कर्णः। स स्यन्दनाद् गामगमद् गतासुः परश्वधैः शाल इवावरुग्णः ॥ ५ ॥
तब कर्णने हँसकर तीन अर्धचन्द्राकार बाणोंसे उग्रकर्माकी दोनों भुजाएँ और मस्तक काट डाले। वह प्राणशून्य होकर कुल्हाड़ीके काटे हुए साखूके पेड़के समान रथसे पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ ५॥
हताश्वमज्जोगतिभिः प्रसेनः शिनिप्रवीरं निशितैः पृषत्कैः। प्रच्छाद्य नृत्यन्निव कर्णपुत्रः शैनेयबाणाभिहतः पपात ॥ ६ ॥
उधर कर्णने जब सात्यकिके घोड़े मार डाले, तब कर्णपुत्र प्रसेनने तीव्रगामी पैने बाणोंद्वारा शिनिप्रवर सात्यकिको ढक दिया। इसके बाद सात्यकिके बाणोंकी चोट खाकर वह नाचता हुआ-सा पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ ६॥
पुत्रे हते क्रोधपरीतचेताः कर्णः शिनीनामृषभं जिघांसुः। हतोऽसि शैनेय इति ब्रुवन् स व्यवासृजद् बाणममित्रसाहम् ॥ ७ ॥
पुत्रके मारे जानेपर क्रोधसे व्याकुलचित्त हुए कर्णने शिनिप्रवर सात्यकिका वध करनेके लिये उनपर एक शत्रु-नाशक बाण छोड़ा और कहा—'सात्यके! अब तू मारा गया'॥
तमस्य चिच्छेद शरं शिखण्डी त्रिभिस्त्रिभिश्च प्रतुतोद कर्णम्। शिखण्डिनः कार्मुकं च ध्वजं च छित्त्वा क्षुराभ्यां न्यपतत् सुजातः ॥ ८ ॥
परंतु उसके उस बाणको शिखण्डीने तीन बाणोंद्वारा काट दिया और उसे भी तीन बाणोंसे पीड़ित कर दिया। तब कर्णने दो छुरोंसे शिखण्डीकी ध्वजा और धनुष काटकर नीचे गिरा दिये॥ ८॥
शिखण्डिनं षड्भिरविध्यदुग्रो धार्ष्टद्युम्नेः स शिरश्चोच्चकर्त। तथाभिनत् सुतसोमं शरेण
सुसंशितेनाधिरथिर्महात्मा ॥ ९ ॥ फिर भयंकर वीर कर्णने छः बाणोंसे शिखण्डीको घायल कर दिया और धृष्टद्युम्नके पुत्रका मस्तक काट डाला। साथ ही महामनस्वी अधिरथपुत्रने अत्यन्त तीखे बाणसे सुतसोमको भी क्षत-विक्षत कर दिया ॥ ९ ॥ अथाक्रन्दे तुमुले वर्तमाने धार्ष्टद्युम्ने निहते तत्र कृष्णः । अपाञ्चाल्यं क्रियते याहि पार्थ कर्णं जहीत्यब्रवीद् राजसिंह ॥ १० ॥ राजसिंह! इस प्रकार जब वह भयंकर घमासान युद्ध चलने लगा और धृष्टद्युम्नका पुत्र मारा गया, तब भगवान् श्रीकृष्णने वहाँ अर्जुनसे कहा—‘पार्थ! कर्ण पांचालोंका संहार कर रहा है, अतः आगे बढ़ो और उसे मार डालो’ ॥ १० ॥ ततः प्रहस्याशु नरप्रवीरो रथं रथेनाधिरथेर्जगाम । भये तेषां त्राणमिच्छन् सुबाहु- रभ्याहतानां रथयूथपेन ॥ ११ ॥ तदनन्तर सुन्दर भुजाओंवाले नरवीर अर्जुन हँसकर भयके अवसरपर उन घायल सैनिकोंकी रक्षाके लिये रथसमूहोंके अधिपति विशाल रथके द्वारा सूतपुत्रके रथकी ओर शीघ्रतापूर्वक आगे बढ़े ॥ ११ ॥ विस्फार्य गाण्डीवमथोग्रघोषं ज्यया समाहत्य तले भृशं च । बाणान्धकारं सहसैव कृत्वा जघान नागांश्चरथध्वजांश्च ॥ १२ ॥ उन्होंने भयानक टंकार करनेवाले गाण्डीव धनुषको फैलाकर उसकी प्रत्यंचाद्वारा अपनी हथेलीमें आघात करते हुए सहसा बाणोंद्वारा अन्धकार फैला दिया और शत्रुपक्षके हाथी, घोड़े, रथ एवं ध्वज नष्ट कर दिये ॥ १२ ॥ प्रतिश्रुतिः प्राचरदन्तरिक्षे गुहा गिरीणामपतन् वयांसि । यन्मण्डलज्येन विजृम्भमाणो रौद्रे मुहूर्तेऽभ्यपतत् किरीटी ॥ १३ ॥ उस भयंकर मुहूर्तमें गाण्डीव धनुषकी प्रत्यंचाको मण्डलाकार करके जब किरीटधारी अर्जुन शत्रुसेनापर टूट पड़े तथा बल और प्रतापमें बढ़ने लगे, उस समय धनुषकी टंकारकी प्रतिध्वनि आकाशमें गूँज उठी, जिससे डरे हुए पक्षी पर्वतोंकी कन्दराओंमें छिप गये ॥ तं भीमसेनोऽनुययौ रथेन
पृष्ठे रक्षन् पाण्डवमेकवीरः । तौ राजपुत्रौ त्वरितौ रथाभ्यां कर्णाय यातावरिभिर्विषक्तौ ॥ १४ ॥ प्रमुख वीर भीमसेन पीछेसे पाण्डुनन्दन अर्जुनकी रक्षा करते हुए रथके द्वारा उनका अनुसरण करने लगे। वे दोनों पाण्डवराजकुमार बड़ी उतावलीके साथ शत्रुओंसे जूझते हुए कर्णकी ओर बढ़ने लगे ॥ १४ ॥
तत्रान्तरे सुमहत् सूतपुत्र- श्चक्रे युद्धं सोमकान् सम्प्रमृद्नन् । रथाश्वमातङ्गगणान् जघान प्रच्छादयामास शरैर्दिशश्च ॥ १५ ॥ इसी बीचमें सूतपुत्र कर्णने सोमकोंका संहार करते हुए उनके साथ महान् युद्ध किया। उनके बहुत-से घोड़े, रथ और हाथियोंका वध कर डाला और बाणोंद्वारा सम्पूर्ण दिशाओंको आच्छादित कर दिया ॥ १५ ॥
तमुत्तमौजा जनमेजयश्च क्रुद्धौ युधामन्युशिखण्डिनौ च । कर्णं बिभेदुः सहिताः पृषत्कैः संनर्दमानाः सह पार्षतेन ॥ १६ ॥ उस समय धृष्टद्युम्नके साथ गर्जते हुए उत्तमौजा, जनमेजय, कुपित युधामन्यु और शिखण्डी—से सब संगठित होकर अपने बाणोंद्वारा कर्णको घायल करने लगे ॥ १६ ॥
ते पञ्च पाञ्चालरथप्रवीरा वैकर्तनं कर्णमभिद्रवन्तः । तस्माद् रथाच्च्यावयितुं न शेकु- र्धैर्यात् कृतात्मानमिवेन्द्रियार्थाः ॥ १७ ॥ पांचाल रथियोंमें प्रमुख ये पाँचों वीर वैकर्तन कर्णपर आक्रमण करके भी उसे उस रथसे नीचे न गिरा सके। ठीक उसी तरह, जैसे जिसने अपने मनको वशमें कर रखा है उस योगीको शब्द, स्पर्श आदि विषय धैर्यसे विचलित नहीं कर पाते हैं ॥ १७ ॥
तेषां धनूंषि ध्वजवाजिसूतां- स्तूर्ण पताकाश्च निकृत्य बाणैः । तान् पञ्चभिस्त्वभ्यहनत् पृषत्कैः कर्णस्ततः सिंह इवोन्ननाद ॥ १८ ॥ कर्णने अपने बाणोंद्वारा तुरंत ही उनके धनुष, ध्वज, घोड़े, सारथि और पताकाएँ काट डालीं और पाँच बाणोंसे उन पाँचों वीरोंको भी घायल कर दिया। तत्पश्चात् वह सिंहके समान दहाड़ने लगा ॥ १८ ॥
तस्यास्यतस्तानभिनिघ्नतश्च ज्याबाणहस्तस्य धनुःस्वनेन । साद्रिद्रुमा स्यात् पृथिवी विशीर्णे- त्यतीव मत्वा जनता व्यषीदत् ॥ १९ ॥ कर्ण बाण छोड़ता और शत्रुओंका संहार करता जा रहा था। उसके हाथमें धनुषकी प्रत्यंचा और बाण सदा मौजूद रहते थे। उसके धनुषकी टंकारसे पर्वतों और वृक्षोंसहित यह सारी पृथ्वी विदीर्ण हो जायगी, ऐसा समझकर सब लोग अत्यन्त खिन्न हो उठे थे ॥ १९ ॥
स शक्रचापप्रतिमेन धन्वना भृशायतेनाधिरथिः शरान् सृजन् । बभौ रणे दीप्तमरीचिमण्डलो यथांशुमाली परिवेशवांस्तथा ॥ २० ॥ इन्द्रधनुषके समान खींचे हुए मण्डलाकार विशाल धनुषके द्वारा बाणोंकी वर्षा करता हुआ अधिरथपुत्र कर्ण रणभूमिमें प्रकाशमान किरणोंवाले परिधियुक्त अंशुमाली सूर्यके समान शोभा पा रहा था ॥ २० ॥
शिखण्डिनं द्वादशभिः पराभिन- च्छितैः शरैः षड्भिरथोत्तमौजसम् । त्रिभिर्युधामन्युमविध्यदाशुगै- स्त्रिभिस्त्रिभिः सोमकपार्षतात्मजौ ॥ २१ ॥ उसने शिखण्डीको बारह, उत्तमौजाको छः, युधामन्युको तीन तथा जनमेजय और धृष्टद्युम्नको भी तीन-तीन पैने बाणोंसे अत्यन्त घायल कर दिया ॥ २१ ॥
पराजिताः पञ्च महारथास्तु ते महाहवे सूतसुतेन मारिष । निरुद्यमास्तस्थुरमित्रनन्दना यथेन्द्रियार्थात्मवता पराजिताः ॥ २२ ॥ आर्य! जैसे मनको वशमें रखनेवाले जितेन्द्रिय पुरुषके द्वारा पराजित हुए विषय उसे आकृष्ट नहीं कर पाते, उसी प्रकार महासमरमें सूतपुत्र कर्णके द्वारा परास्त हुए वे पाँचों पांचाल वीर निश्चेष्टभावसे खड़े हो गये और शत्रुओंका आनन्द बढ़ाने लगे ॥ २२ ॥
निमज्जतस्तानथ कर्णसागरे विपन्ननावो वणिजो यथार्णवे । उद्ध्रिरे नौभिरिवार्णवाद् रथैः सुकल्पितैर्द्रौपदिजाः स्वमातुलान् ॥ २३ ॥ जैसे समुद्रमें जिनकी नाव डूब गयी हो, उन डूबते हुए व्यापारियोंको दूसरी नौकाओंद्वारा लोग बचा लेते हैं, उसी प्रकार द्रौपदीके पुत्रोंने कर्णरूपी सागरमें डूबनेवाले
अपने उन मामाओंको रण-सामग्रीसे सजे-सजाये रथोंद्वारा बचाया ॥ २३ ॥
ततः शिनीनामृषभः शितैः शरै-
र्निकृत्य कर्णप्रहितानिक्षून् बहून् ।
विदार्य कर्णं निशितैरयस्मयै-
स्तवात्मजं ज्येष्ठमविध्यदष्टभिः ॥ २४ ॥
तत्पश्चात् शिनिप्रवर सात्यकिने कर्णके छोड़े हुए बहुत-से बाणोंको अपने तीखे बाणोंसे काटकर लोहेके पैने बाणोंसे कर्णको घायल करनेके पश्चात् आपके ज्येष्ठ पुत्र दुर्योधनको आठ बाण मारकर बींध डाला ॥ २४ ॥
कृपोऽथ भोजश्च तवात्मजस्तथा
स्वयं च कर्णो निशितैरताडयत् ।
स तैश्चतुर्भिर्युयुधे यदूत्तमो
दिगीश्वरैर्दैत्यपतिर्यथा तथा ॥ २५ ॥
तब कृपाचार्य, कृतवर्मा, आपका पुत्र दुर्योधन तथा स्वयं कर्ण भी सात्यकिको तीखे बाणोंसे घायल करने लगे। यदुकुलतिलक सात्यकिने अकेले ही उन चारों वीरोंके साथ उसी प्रकार युद्ध किया, जैसे दैत्यराज हिरण्यकशिपुने चारों दिक्पालोंके साथ किया था ॥ २५ ॥
समाततेनेष्वसनेन कूजता
भृशायतेनामितबाणवर्षिणा ।
बभूव दुर्धर्षतरः स सात्यकिः
शरन्नभोमध्यगतो यथा रविः ॥ २६ ॥
जैसे शरद्-ऋतुके आकाशमण्डलके बीचमें आये हुए मध्याह्नकालिक सूर्य प्रचण्ड हो उठते हैं, उसी प्रकार असंख्य बाणोंकी वर्षा करनेवाले तथा कानतक खींचे जानेके कारण गम्भीर टंकार करनेवाले अपने विशाल धनुषके द्वारा सात्यकि उस समय शत्रुओंके लिये अत्यन्त दुर्जय हो उठे ॥ २६ ॥
पुनः समास्थाय रथान् सुदंशिताः
शिनिप्रवीरं जुगुपुः परंतपाः ।
समेत्य पाञ्चालमहारथा रणे
मरुद्गणाः शक्रमिवारिनिग्रहे ॥ २७ ॥
तदनन्तर शत्रुओंको तपानेवाले पूर्वोक्त पांचाल महारथी कवच पहन रथोंपर आरूढ़ हो पुनः आकर शिनिप्रवर सात्यकिकी रणभूमिमें उसी तरह रक्षा करने लगे, जैसे मरुद्गण शत्रुओंके दमनकालमें देवराज इन्द्रकी रक्षा करते हैं ॥ २७ ॥
ततोऽभवद् युद्धमतीव दारुणं
तवाहितानां तव सैनिकैः सह ।
रथाश्वमातङ्गविनाशनं तथा
यथा सुराणामसुरैः पुराभवत् ॥ २८ ॥ इसके बाद आपके शत्रुओंका आपके सैनिकोंके साथ अत्यन्त दारुण युद्ध होने लगा, जो रथों, घोड़ों और हाथियोंका विनाश करनेवाला था। वह युद्ध प्राचीन कालके देवासुर-संग्रामके समान जान पड़ता था ॥ २८ ॥
रथा द्विपा वाजिपदातयस्तथा भवन्ति नानाविधशस्त्रवेष्टिताः । परस्परेणाभिहताश्च चस्खलु- र्विनेदुरार्ता व्यसवोऽपतंस्तथा ॥ २९ ॥ बहुत-से रथी, सवारोंसहित हाथी, घोड़े तथा पैदल सैनिक नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे आच्छादित हो एक-दूसरेसे टकराकर लड़खड़ाने लगते, आर्तनाद करते और प्राणशून्य होकर गिर पड़ते थे ॥ २९ ॥
तथागते भीममभीस्तवात्मजः ससार राजावरजः किरन् शरैः । तमभ्यधावत् त्वरितो वृकोदरो महारुरुं सिंह इवाभिपेदिवान् ॥ ३० ॥ राजन्! इस प्रकार जब वह भयंकर संग्राम चल रहा था, उसी समय राजा दुर्योधनका छोटा भाई आपका पुत्र दुःशासन निर्भय हो बाणोंकी वर्षा करता हुआ भीमसेनपर चढ़ आया। उसे देखते ही भीमसेन भी बड़े उतावले होकर उसकी ओर दौड़े और जिस प्रकार सिंह महारुरु नामक मृगपर आक्रमण करता है, उसी प्रकार उसके पास जा पहुँचे ॥
ततस्तयोर्युद्धमतीव दारुणं प्रदीव्यतोः प्राणदुरोदरं द्वयोः । परस्परेणाभिनिविष्टरोषयो- रुदग्रयोः शम्बरशक्रयोर्यथा ॥ ३१ ॥ उन दोनोंके मनमें एक-दूसरेके प्रति महान् रोष भरा हुआ था। दोनों ही प्राणोंकी बाजी लगाकर अत्यन्त भयंकर युद्धका जूआ खेल रहे थे। उन प्रचण्ड वीरोंका वह संग्राम शम्बरासुर और इन्द्रके समान हो रहा था ॥
शरैः शरीरार्तिकरैः सुतेजनै- र्निजघ्नतुस्तावितरेतरं भृशम् । सकृत्प्रभिन्नाविव वासितान्तरे महागजौ मन्मथसक्तचेतसौ ॥ ३२ ॥ शरीरको पीड़ा देनेवाले अत्यन्त पैने बाणोंद्वारा वे दोनों वीर एक-दूसरेको गहरी चोट पहुँचाने लगे; मानो मैथुनकी इच्छावाली हथिनीके लिये कामासक्त चित्त होकर दो मदस्रावी गजराज परस्पर आघात करते हों ॥ ३२ ॥
(आलोक्य तौ तत्र परस्परं ततः समं च शूरौ च ससारथी तदा । भीमोऽब्रवीद् याहि दुःशासनाय दुःशासनो याहि वृकोदराय ॥ सारथिसहित उन दोनों शूरवीरोंने जब वहाँ एक-दूसरेको एक साथ देखा तब भीमने अपने सारथिसे कहा—'दुःशासनकी ओर चलो' और दुःशासनने अपने सारथिसे कहा—'भीमसेनकी ओर चलो'।
तयोरथौ सारथिभ्यां प्रचोदितौ समं रणे तौ सहसा समीयतुः । नानायुधौ चित्रपताकिनौ ध्वजौ दिवीव पूर्वं बलशक्रयो रणे ॥ सारथियोंद्वारा एक साथ हाँके गये उन दोनोंके रथ रणभूमिमें दोनोंके पास सहसा जा पहुँचे। वे दोनों ही रथ नाना प्रकारके आयुधोंसे सम्पन्न तथा विचित्र पताकाओं और ध्वजाओंसे सुशोभित थे। जैसे पूर्वकालमें स्वर्गके निमित्त होनेवाले युद्धमें बलासुर और इन्द्रके रथ थे, उसी प्रकार दुःशासन और भीमसेनके भी थे।
भीम उवाच
दिष्ट्यासि दुःशासन मेऽद्य दृष्टः ऋणं प्रतीच्छे सहवृद्धिमूलम् । चिरोद्यतं यन्मया ते सभायां कृष्णाभिमर्शेन गृहाण मत्तः ॥ **भीमसेन बोले—**दुःशासन! बड़े सौभाग्यकी बात है कि तू आज मुझे दिखायी दिया है। कौरव-सभामें द्रौपदीका स्पर्श करनेके कारण दीर्घकालसे जो तेरा ऋण मेरे ऊपर चढ़ गया है, उसे मैं आज ब्याज और मूलसहित चुकाना चाहता हूँ। तू मुझसे वह सब ग्रहण कर।
संजय उवाच
स एवमुक्तस्तु ततो महात्मा दुःशासनो वाक्यमुवाच वीरः । **संजय कहते हैं—**राजन्! भीमसेनके ऐसा कहनेपर महामनस्वी वीर दुःशासनने इस प्रकार कहा।
दुःशासन उवाच
सर्वं स्मरे नैव च विस्मरामि उदीर्यमाणं शृणु भीमसेन ॥
स्मरामि चात्मप्रभवं चिराय
यज्जातुषे वेश्मनि रात्र्यहानि ।
विश्वासहीना मृगयां चरन्तो
वसन्ति सर्वत्र निराकृतास्तु ॥
दुःशासन बोला— भीमसेन! मुझे सब कुछ याद है। मैं भूलता नहीं हूँ। तुम मेरी कही हुई बात सुनो। मैं अपनी की हुई सारी बातोंको चिरकालसे याद रखता हूँ। पहले तुमलोग लाक्षागृहमें रात-दिन सशंक होकर निवास करते थे। फिर वहाँसे निकाले जाकर वनमें सर्वत्र शिकार खेलते हुए रहने लगे।
महाभये रात्र्यहनी स्मरन्त-
स्तथोपभोगाच्च सुखाच्च हीनाः ।
वनेष्वटन्तो गिरिगुह्वराणि
पाञ्चालराजस्य पुरं प्रविष्टाः ॥
मायां यूयं कामपि सम्प्रविष्टा
यतो वृतः कृष्णया फाल्गुनो वः ।
रात-दिन महान् भयमें डूबे रहकर तुम चिन्तामें पड़े रहते और सुख एवं उपभोगसे वंचित हो जंगलों तथा पर्वतकी कन्दराओंमें घूमते थे। इसी अवस्थामें तुम सब लोग एक दिन पांचालराजके नगरमें जा घुसे। वहाँ तुम लोगोंने किसी मायामें प्रविष्ट होकर अपने स्वरूपको छिपा लिया था; इसलिये द्रौपदीने तुमलोगोंमेंसे अर्जुनका वरण कर लिया।
सम्भ्रूय पापैस्तदनार्यवृत्तं
कृतं तदा मातृकृतानुरूपम् ॥
एको वृतः पञ्चभिः साभिपन्ना
ह्यलज्जमानैश्च परस्परस्य ।
स्मरे सभायां सुबलात्मजेन
दासीकृताः स्थ सह कृष्णया च ॥)
परंतु तुम सब पापियोंने मिलकर उसके साथ वह नीचोंका-सा बर्ताव किया, जो तुम्हारी माताकी करनीके अनुरूप था। द्रौपदीने तो एकहीका वरण किया, परंतु तुम पाँचोंने उसे अपनी पत्नी बनाया और इस कार्यमें तुम्हें एक-दूसरेसे तनिक भी लज्जा नहीं हुई। मुझे यह भी याद है कि कौरवसभामें शकुनिने द्रौपदीसहित तुम सब लोगोंको दास बना लिया था।
संजय उवाच
(इत्येवमुक्तस्तु तवात्मजेन
पाण्डोः सुतः कोपवशं जगाम ।)
तवात्मजस्याथ वृकोदरस्त्वरन्
धनुःक्षुराभ्यां ध्वजमेव चाच्छिनत् ।
ललाटमप्यस्य बिभेद पत्रिणा
शिरश्च कायात् प्रजहार सारथेः ॥ ३३ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! आपके पुत्रके ऐसा कहनेपर पाण्डुकुमार भीमसेन क्रोधके वशीभूत हो गये। वृकोदरने बड़ी उतावलीके साथ दो क्षुरोंके द्वारा आपके पुत्र दुःशासनके धनुष और ध्वजको काट दिया, एक बाणसे उसके ललाटमें घाव कर दिया और दूसरेसे उसके सारथिका मस्तक भी धड़से अलग कर दिया ॥ ३३ ॥
स राजपुत्रोऽन्यदवाप्य कार्मुकं
वृकोदरं द्वादशभिः पराभिनत् ।
स्वयं नियच्छंस्तुरगानजिह्मगैः
शरैश्च भीमं पुनरप्यवीवृषत् ॥ ३४ ॥
तब राजकुमार दुःशासनने भी दूसरा धनुष लेकर भीमसेनको बारह बाणोंसे बींध डाला और स्वयं ही घोड़ोंको काबूमें रखते हुए उसने पुनः उनके ऊपर सीधे जानेवाले बाणोंकी झड़ी लगा दी ॥ ३४ ॥
ततः शरं सूर्यमरीचिसप्रभं
सुवर्णवज्रोत्तमरत्नभूषितम् ।
महेन्द्रवज्राशनिपातदुःसहं
मुमोच भीमाङ्गविदारणक्षमम् ॥ ३५ ॥
इसके बाद दुःशासनने सूर्यकी किरणोंके समान कान्तिमान्, सुवर्ण और हीरे आदि उत्तम रत्नोंसे विभूषित तथा देवराज इन्द्रके वज्र एवं विद्युत्पातके समान दुःसह एक ऐसा भयंकर बाण छोड़ा, जो भीमसेनके अंगोंको विदीर्ण कर देनेमें समर्थ था ॥ ३५ ॥
स तेन निर्विद्धतनुर्वृकोदरो
निपातितः स्रस्ततनुर्गतासुवत् ।
प्रसार्य बाहू रथवर्यमाश्रितः
पुनः स संज्ञामुपलभ्य चानदत् ॥ ३६ ॥
उससे भीमसेनका शरीर छिद गया। वे बहुत शिथिल हो गये और प्राणहीनके समान दोनों बाँहें फैलाकर अपने श्रेष्ठ रथपर लुढ़क गये। फिर थोड़ी ही देरमें होशमें आकर भीमसेन सिंहके समान दहाड़ने लगे ॥ ३६ ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि दुःशासनभीमसेनयुद्धे द्व्यशीतितमोऽध्यायः ॥ ८२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें दुःशासन और भीमसेनका युद्धविषयक बयासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८२ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ८ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ४४ १/३ श्लोक हैं।)
अध्याय (पृष्ठ 2270)
त्र्यशीतितमोऽध्यायः
भीमद्वारा दुःशासनका रक्तपान और उसका वध, युधामन्युद्वारा चित्रसेनका वध तथा भीमका हर्षोद्गार
संजय उवाच
तत्राकरोद् दुष्करं राजपुत्रो
दुःशासनस्तुमुलं युद्ध्यमानः ।
चिच्छेद भीमस्य धनुः शरेण
षष्ट्या शरैः सारथिमप्यविध्यत् ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! वहाँ तुमुल युद्ध करते हुए राजकुमार दुःशासनने दुष्कर पराक्रम प्रकट किया। उसने एक बाणसे भीमसेनका धनुष काट डाला और साठ बाणोंसे उनके सारथिको भी घायल कर दिया ॥ १ ॥
स तत् कृत्वा राजपुत्रस्तरस्वी
विव्याध भीमं नवभिः पृषत्कैः ।
ततोऽभिनद् बहुभिः क्षिप्रमेव
वरेषुभिर्भीमसेनं महात्मा ॥ २ ॥
ऐसा करके उस वेगशाली राजपुत्रने भीमसेनपर नौ बाणोंका प्रहार किया। इसके बाद महामना दुःशासनने बड़ी फुर्तीके साथ बहुत-से उत्तम बाणोंद्वारा भीमसेनको अच्छी तरह बींध डाला ॥ २ ॥
ततः क्रुद्धो भीमसेनस्तरस्वी
शक्तिं चोग्रां प्राहिणोत् ते सुताय ।
तामापतन्तीं सहसातिघोरां
दृष्ट्वा सुतस्ते ज्वलितामिवोल्काम् ॥ ३ ॥
आकर्णपूर्णैरिषुभिर्महात्मा
चिच्छेद पुत्रो दशभिः पृषत्कैः ।
तब क्रोधमें भरे हुए वेगशाली भीमसेनने आपके पुत्रपर एक भयंकर शक्ति छोड़ी। प्रज्वलित उल्काके समान उस अत्यन्त भयानक शक्तिको सहसा अपने ऊपर आती देख आपके महामनस्वी पुत्रने कानतक खींचकर छोड़े हुए दस बाणोंके द्वारा उसे काट डाला ॥ ३ १/२ ॥
दृष्ट्वा तु तत् कर्म कृतं सुदुष्करं
प्रापूजयन् सर्वयोधाः प्रहृष्टाः ॥ ४ ॥
अथाशु भीमं च शरेण भूयो गाढं स विव्याध सुतस्त्वदीयः । चुक्रोध भीमः पुनराशु तस्मै भृशं प्रजज्वाल रुषाभिवीक्ष्य ॥ ५ ॥ उसके इस अत्यन्त दुष्कर कर्मको देखकर सभी योद्धा बड़े प्रसन्न हुए और उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे। फिर आपके पुत्रने तुरंत ही एक बाण मारकर भीमसेनको गहरी चोट पहुँचायी। इससे फिर उन्हें बड़ा क्रोध हुआ। वे उसकी ओर देखकर शीघ्र ही रोषसे प्रज्वलित हो उठे ॥ ४-५ ॥ विद्धोऽस्मि वीराशु भृशं त्वयाद्य सहस्व भूयोऽपि गदाप्रहारम् । उक्त्वैवमुच्चैः कुपितोऽथ भीमो जग्राह तां भीमगदां वधाय ॥ ६ ॥ और बोले—'वीर! तूने तो आज मुझे शीघ्रतापूर्वक बाण मारकर बहुत घायल कर दिया; किंतु अब स्वयं भी मेरी गदाका प्रहार सहन कर।' उच्च स्वरसे ऐसा कहकर कुपित हुए भीमसेनने दुःशासनके वधके लिये एक भयंकर गदा हाथमें ले ली ॥ ६ ॥ उवाच चाद्याहमहं दुरात्मन् पास्यामि ते शोणितमाजिमध्ये । अथैवमुक्तस्तनयस्तवोग्रां शक्तिं वेगात् प्राहिणोन्मृत्युरूपाम् ॥ ७ ॥ फिर वे इस प्रकार बोले—'दुरात्मन्! आज इस संग्राममें मैं तेरा रक्त-पान करूँगा।' भीमके ऐसा कहते ही आपके पुत्रने उनके ऊपर बड़े वेगसे एक भयंकर शक्ति चलायी, जो मृत्युरूप जान पड़ती थी ॥ ७ ॥ आविध्य भीमोऽपि गदां सुघोरां विचिक्षिपे रोषपरीतमूर्तिः । सा तस्य शक्तिं सहसा विरुज्य पुत्रं तवाजौ ताडयामास मूर्ध्नि ॥ ८ ॥ इधरसे रोषमें भरे हुए भीमसेनने भी अपनी अत्यन्त घोर गदा घुमाकर फेंकी। वह गदा रणभूमिमें दुःशासनकी उस शक्तिको टूक-टूक करती हुई सहसा उसके मस्तकमें जा लगी ॥ ८ ॥ स विक्षरन् नाग इव प्रभिन्नो गदामस्मै तुमुले प्राहिणोद् वै । तयाहरद् दश धन्वन्तराणि दुःशासनं भीमसेनः प्रसह्य ॥ ९ ॥
मदस्रावी गजराजके समान अपने घावोंसे रक्त बहाते हुए भीमसेनने उस तुमुल युद्धमें दुःशासनपर जो गदा चलायी थी, उसके द्वारा उन्होंने उसे बलपूर्वक दस धनुष (चालीस हाथ) पीछे हटा दिया ॥ ९ ॥
तया हतः पतितो वेपमानो दुःशासनो गदया वेगवत्या । विध्वस्तवर्माभरResource/ambarasrag: विध्वस्तवर्माभरणाम्बरस्रग् विचेष्टमानो भृशवेदनातुरः ॥ १० ॥
दुःशासन उस वेगवती गदाके आघातसे धरतीपर गिरकर काँपने और अत्यन्त वेदनासे व्याकुल हो छटपटाने लगा। उसका कवच टूट गया, आभूषण और हार बिखर गये तथा कपड़े फट गये थे ॥ १० ॥
हयाः ससूता निहता नरेन्द्र चूर्णीकृतश्चास्य रथः पतन्त्या । दुःशासनं पाण्डवाः प्रेक्ष्य सर्वे हृष्टाः पञ्चालाः सिंहनादानमुञ्चन् ॥ ११ ॥
नरेन्द्र! उस गदाने गिरते ही दुःशासनके रथको चूर-चूर कर डाला और सारथिसहित उसके घोड़ोंको भी मार डाला। दुःशासनको उस अवस्थामें देखकर समस्त पाण्डव और पांचाल-योद्धा हर्षमें भरकर सिंहनाद करने लगे ॥ ११ ॥
तं पातयित्वाथ वृकोदरोऽथ जगर्ज हर्षेण विनादयन् दिशः । नादेन तेनाखिलपार्श्ववर्तिनो मूर्च्छाकुलाः पतितास्त्वजामीढ ॥ १२ ॥
इस प्रकार वृकोदर भीम दुःशासनको धराशायी करके हर्षसे उल्लसित हो सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करते हुए जोर-जोरसे गर्जना करने लगे। अजमीढ़वंशी नरेश! उस सिंहनादसे भयभीत हो आस-पास खड़े हुए समस्त योद्धा मूर्च्छित होकर गिर पड़े ॥ १२ ॥
भीमोऽपि वेगादवतीर्य यानाद् दुःशासनं वेगवानभ्यधावत् । ततः स्मृत्वा भीमसेनस्तरस्वी सापत्नकं यत् प्रयुक्तं सुतैस्ते ॥ १३ ॥
फिर भीमसेन भी शीघ्रतापूर्वक रथसे उतरकर बड़े वेगसे दुःशासनकी ओर दौड़े। उस समय वेगशाली भीमसेनको आपके पुत्रोंद्वारा किये गये शत्रुतापूर्ण बर्ताव याद आने लगे थे ॥ १३ ॥
तस्मिन् सुघोरे तुमुले वर्तमाने प्रधानभूयिष्ठतरैः समन्तात् ।
दुःशासनं तत्र समीक्ष्य राजन् भीमो महाबाहुरचिन्त्यकर्मा ॥ १४ ॥ स्मृत्वाथ केशग्रहणं च देव्या वस्त्रापहारं च रजस्वलायाः । अनागसो भर्तृपराङ्मुखाया दुःखानि दत्तान्यपि विप्रचिन्त्य ॥ १५ ॥ जज्वाल क्रोधादथ भीमसेन आज्यप्रसिक्तो हि यथा हुताशः । राजन्! वहाँ चारों ओर जब प्रधान-प्रधान वीरोंका वह अत्यन्त घोर तुमुल युद्ध चल रहा था, उस समय अचिन्त्यपराक्रमी महाबाहु भीमसेन दुःशासनको देखकर पिछली बातें याद करने लगे—‘देवी द्रौपदी रजस्वला थी। उसने कोई अपराध नहीं किया था। उसके पति भी उसकी सहायतासे मुँह मोड़ चुके थे तो भी इस दुःशासनने द्रौपदीके केश पकड़े और भरी सभामें उसके वस्त्रोंका अपहरण किया।' उसने और भी जो-जो दुःख दिये थे, उन सबको याद करके भीमसेन घीकी आहुतिसे प्रज्वलित हुई अग्निके समान क्रोधसे जल उठे ॥ १४-१५ १/२ ॥
तत्राह कर्णं च सुयोधनं च कृपं द्रौणिं कृतवर्माणमेव ॥ १६ ॥ निहन्मि दुःशासनमद्य पापं संरक्ष्यतामद्य समस्तयोधाः । उन्होंने वहाँ कर्ण, दुर्योधन, कृपाचार्य, अश्वत्थामा और कृतवर्माको सम्बोधित करके कहा—‘आज मैं पापी दुःशासनको मारे डालता हूँ। तुम समस्त योद्धा मिलकर उसकी रक्षा कर सको तो करो' ॥ १६ १/२ ॥
इत्येवमुक्त्वा सहसाभ्यधाव- न्निहन्तुकामोऽतिबलस्तरस्वी ॥ १७ ॥ तथा तु विक्रम्य रणे वृकोदरो महागजं केसरिको यथैव । निगृह्य दुःशासनमेकवीरः सुयोधनस्याधिरथेः समक्षम् ॥ १८ ॥ रथादवप्लुत्य गतः स भूमौ यत्नेन तस्मिन् प्रणिधाय चक्षुः । असिं समुद्यम्य सितं सुधारं कण्ठे पदाऽऽक्रम्य च वेपमानम् ॥ १९ ॥
ऐसा कहकर अत्यन्त बलवान् वेगशाली एवं अद्वितीय वीर भीमसेन अपने रथसे कूदकर पृथ्वीपर आ गये और दुःशासनको मार डालनेकी इच्छासे सहसा उसकी ओर दौड़े। उन्होंने युद्धमें पराक्रम करके दुर्योधन और कर्णके सामने ही दुःशासनको उसी प्रकार धर दबाया, जैसे सिंह किसी विशाल हाथीपर आक्रमण कर रहा हो। वे यत्नपूर्वक उसीकी ओर दृष्टि जमाये हुए थे। उन्होंने उत्तम धारवाली सफेद तलवार उठा ली और उसके गलेपर लात मारी। उस समय दुःशासन थरथर काँप रहा था ॥ १७—१९ ॥
उवाच तद्गौरिति यद् ब्रुवाणो
हृष्टो वदेः कर्णसुयोधनाभ्याम् ।
ये राजसूयावभृथे पवित्रा
जाताः कचा याज्ञसेन्या दुरात्मन् ॥ २० ॥
ते पाणिना कतरेणावकृष्टा-
स्तद् ब्रूहि त्वां पृच्छति भीमसेनः ।
वे उससे इस प्रकार बोले—'दुरात्मन्! याद है न वह दिन, जब तुमने कर्ण और दुर्योधनके साथ बड़े हर्षमें भरकर मुझे 'बैल' कहा था। राजसूययज्ञमें अवभृथस्नानसे पवित्र हुए महारानी द्रौपदीके केश तूने किस हाथसे खींचे थे? बता, आज भीमसेन तुझसे यह पूछता और इसका उत्तर चाहता है' ॥ २० १/२ ॥
श्रुत्वा तु तद् भीमवचः सुघोरं
दुःशासनो भीमसेनं निरीक्ष्य ॥ २१ ॥
जज्वाल भीमं स तदा स्मयेन
संशृण्वतां कौरवसोमकानाम् ।
उक्तस्तदाऽऽजौ स तथा सरोषं
जगाद भीमं परिवर्तनेत्रः ॥ २२ ॥
भीमसेनका यह अत्यन्त भयंकर वचन सुनकर दुःशासनने उनकी ओर देखा। देखते ही वह क्रोधसे जल उठा। युद्धस्थलमें उनके वैसा कहनेपर उसकी त्यौरी बदल गयी थी; अतः वह समस्त कौरवों तथा सोमकोंके सुनते-सुनते मुसकराकर रोषपूर्वक बोला—॥ २१-२२ ॥
अयं करिकराकारः पीनस्तनविमर्दनः ।
गोसहस्रप्रदाता च क्षत्रियान्तकरः करः ॥ २३ ॥
अनेन याज्ञसेन्या मे भीम केशा विकर्षिताः ।
पश्यतां कुरुमुख्यानां युष्माकं च सभासदाम् ॥ २४ ॥
'यह है हाथीकी सूँडके समान मोटा मेरा हाथ, जो रमणीके ऊँचे उरोजोंका मर्दन, सहस्रों गोदान तथा क्षत्रियों-का विनाश करनेवाला है। भीमसेन! इसी हाथसे मैंने सभामें
बैठे हुए कुरुकुलके श्रेष्ठ पुरुषों और तुमलोगोंके देखते-देखते द्रौपदीके केश खींचे थे'।। २३-२४ ।। एवं त्वसौ राजसुतं निशम्य ब्रुवन्तमाजौ विनिपीड्य वक्षः। भीमो बलात्तं प्रतिगृह्य दोर्भ्या- मुच्चैर्ननादाथ समस्तयोधान् ॥ २५ ॥ उवाच यस्यास्ति बलं स रक्ष- त्वसौ भवेद्य निरस्तबाहुः। दुःशासनं जीवितं प्रोत्सृजन्त- माक्षिप्य योधांस्तरसा महाबलः ॥ २६ ॥ एवं क्रुद्धो भीमसेनः करेण उत्पाटयामास भुजं महात्मा। दुःशासनं तेन स वीरमध्ये जघान वज्राशनिसंनिभेन ॥ २७ ॥
युद्धस्थलमें ऐसी बात कहते हुए राजकुमार दुःशासनकी छातीपर चढ़कर भीमसेनने उसे दोनों हाथोंसे बलपूर्वक पकड़ लिया और उच्च स्वरसे सिंहनाद करते हुए समस्त योद्धाओंसे कहा—'आज दुःशासनकी बाँह उखाड़ी जा रही है। यह अब अपने प्राणोंको त्यागना ही चाहता है। जिसमें बल हो, वह आकर इसे मेरे हाथसे बचा ले।' इस प्रकार समस्त योद्धाओंको ललकारकर महाबली, महामनस्वी, कुपित भीमसेनने एक ही हाथसे वेगपूर्वक दुःशासनकी बाँह उखाड़ ली। उसकी वह बाँह वज्रके समान कठोर थी। भीमसेन समस्त वीरोंके बीच उसीके द्वारा उसे पीटने लगे॥ २५—२७॥
उत्कृत्य वक्षः पतितस्य भूमा- वथापिबच्छोणितमस्य कोष्णम्। ततो निपात्यास्य शिरोऽपकृत्य तेनासिना तव पुत्रस्य राजन् ॥ २८ ॥ सत्यां चिकीर्षुर्मतिमान् प्रतिज्ञां भीमोऽपिबच्छोणितमस्य कोष्णम्। आस्वाद्य चास्वाद्य च वीक्षमाणः क्रुद्धो हि चैनं निजगाद वाक्यम् ॥ २९ ॥
इसके बाद पृथ्वीपर पड़े हुए दुःशासनकी छाती फाड़कर वे उसका गरम-गरम रक्त पीनेका उपक्रम करने लगे। राजन्! उठनेकी चेष्टा करते हुए दुःशासनको पुनः गिराकर बुद्धिमान् भीमसेनने अपनी प्रतिज्ञा सत्य करनेके लिये तलवारसे आपके पुत्रका मस्तक