भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 2262, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 2262

पृष्ठे रक्षन् पाण्डवमेकवीरः । तौ राजपुत्रौ त्वरितौ रथाभ्यां कर्णाय यातावरिभिर्विषक्तौ ॥ १४ ॥ प्रमुख वीर भीमसेन पीछेसे पाण्डुनन्दन अर्जुनकी रक्षा करते हुए रथके द्वारा उनका अनुसरण करने लगे। वे दोनों पाण्डवराजकुमार बड़ी उतावलीके साथ शत्रुओंसे जूझते हुए कर्णकी ओर बढ़ने लगे ॥ १४ ॥

तत्रान्तरे सुमहत् सूतपुत्र- श्चक्रे युद्धं सोमकान् सम्प्रमृद्नन् । रथाश्वमातङ्गगणान् जघान प्रच्छादयामास शरैर्दिशश्च ॥ १५ ॥ इसी बीचमें सूतपुत्र कर्णने सोमकोंका संहार करते हुए उनके साथ महान् युद्ध किया। उनके बहुत-से घोड़े, रथ और हाथियोंका वध कर डाला और बाणोंद्वारा सम्पूर्ण दिशाओंको आच्छादित कर दिया ॥ १५ ॥

तमुत्तमौजा जनमेजयश्च क्रुद्धौ युधामन्युशिखण्डिनौ च । कर्णं बिभेदुः सहिताः पृषत्कैः संनर्दमानाः सह पार्षतेन ॥ १६ ॥ उस समय धृष्टद्युम्नके साथ गर्जते हुए उत्तमौजा, जनमेजय, कुपित युधामन्यु और शिखण्डी—से सब संगठित होकर अपने बाणोंद्वारा कर्णको घायल करने लगे ॥ १६ ॥

ते पञ्च पाञ्चालरथप्रवीरा वैकर्तनं कर्णमभिद्रवन्तः । तस्माद् रथाच्च्यावयितुं न शेकु- र्धैर्यात् कृतात्मानमिवेन्द्रियार्थाः ॥ १७ ॥ पांचाल रथियोंमें प्रमुख ये पाँचों वीर वैकर्तन कर्णपर आक्रमण करके भी उसे उस रथसे नीचे न गिरा सके। ठीक उसी तरह, जैसे जिसने अपने मनको वशमें कर रखा है उस योगीको शब्द, स्पर्श आदि विषय धैर्यसे विचलित नहीं कर पाते हैं ॥ १७ ॥

तेषां धनूंषि ध्वजवाजिसूतां- स्तूर्ण पताकाश्च निकृत्य बाणैः । तान् पञ्चभिस्त्वभ्यहनत् पृषत्कैः कर्णस्ततः सिंह इवोन्ननाद ॥ १८ ॥ कर्णने अपने बाणोंद्वारा तुरंत ही उनके धनुष, ध्वज, घोड़े, सारथि और पताकाएँ काट डालीं और पाँच बाणोंसे उन पाँचों वीरोंको भी घायल कर दिया। तत्पश्चात् वह सिंहके समान दहाड़ने लगा ॥ १८ ॥

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