भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2261

सुसंशितेनाधिरथिर्महात्मा ॥ ९ ॥ फिर भयंकर वीर कर्णने छः बाणोंसे शिखण्डीको घायल कर दिया और धृष्टद्युम्नके पुत्रका मस्तक काट डाला। साथ ही महामनस्वी अधिरथपुत्रने अत्यन्त तीखे बाणसे सुतसोमको भी क्षत-विक्षत कर दिया ॥ ९ ॥ अथाक्रन्दे तुमुले वर्तमाने धार्ष्टद्युम्ने निहते तत्र कृष्णः । अपाञ्चाल्यं क्रियते याहि पार्थ कर्णं जहीत्यब्रवीद् राजसिंह ॥ १० ॥ राजसिंह! इस प्रकार जब वह भयंकर घमासान युद्ध चलने लगा और धृष्टद्युम्नका पुत्र मारा गया, तब भगवान् श्रीकृष्णने वहाँ अर्जुनसे कहा—‘पार्थ! कर्ण पांचालोंका संहार कर रहा है, अतः आगे बढ़ो और उसे मार डालो’ ॥ १० ॥ ततः प्रहस्याशु नरप्रवीरो रथं रथेनाधिरथेर्जगाम । भये तेषां त्राणमिच्छन् सुबाहु- रभ्याहतानां रथयूथपेन ॥ ११ ॥ तदनन्तर सुन्दर भुजाओंवाले नरवीर अर्जुन हँसकर भयके अवसरपर उन घायल सैनिकोंकी रक्षाके लिये रथसमूहोंके अधिपति विशाल रथके द्वारा सूतपुत्रके रथकी ओर शीघ्रतापूर्वक आगे बढ़े ॥ ११ ॥ विस्फार्य गाण्डीवमथोग्रघोषं ज्यया समाहत्य तले भृशं च । बाणान्धकारं सहसैव कृत्वा जघान नागांश्चरथध्वजांश्च ॥ १२ ॥ उन्होंने भयानक टंकार करनेवाले गाण्डीव धनुषको फैलाकर उसकी प्रत्यंचाद्वारा अपनी हथेलीमें आघात करते हुए सहसा बाणोंद्वारा अन्धकार फैला दिया और शत्रुपक्षके हाथी, घोड़े, रथ एवं ध्वज नष्ट कर दिये ॥ १२ ॥ प्रतिश्रुतिः प्राचरदन्तरिक्षे गुहा गिरीणामपतन् वयांसि । यन्मण्डलज्येन विजृम्भमाणो रौद्रे मुहूर्तेऽभ्यपतत् किरीटी ॥ १३ ॥ उस भयंकर मुहूर्तमें गाण्डीव धनुषकी प्रत्यंचाको मण्डलाकार करके जब किरीटधारी अर्जुन शत्रुसेनापर टूट पड़े तथा बल और प्रतापमें बढ़ने लगे, उस समय धनुषकी टंकारकी प्रतिध्वनि आकाशमें गूँज उठी, जिससे डरे हुए पक्षी पर्वतोंकी कन्दराओंमें छिप गये ॥ तं भीमसेनोऽनुययौ रथेन

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