महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 227, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंपद्भ्यां भीमोऽप्यथो धावंस्तस्य गात्रेष्वलीयत । जानन्नञ्जलिकावेधं नापाक्रामत पाण्डवः ॥ २३ ॥ भीमसेन पैदल दौड़कर उस हाथीके शरीरमें छिप गये। पाण्डुपुत्र भीम अंजलिकावेध* जानते थे। इसलिये वहाँसे भागे नहीं ।। २३ ।।
गात्राभ्यन्तरगो भूत्वा करेणाताडयन्मुहुः । लालयामास तं नागं वधाकाङ्क्षिणमव्ययम् ॥ २४ ॥ वे उसके शरीरके नीचे होकर हाथसे बारंबार थपथपाते हुए वधकी आकांक्षा रखनेवाले उस अविनाशी गजराजको लाड़-प्यार करने लगे ।। २४ ।।
कुलालचक्रवन्नागस्तदा तूर्णमथाभ्रमत् । नागायुतबलः श्रीमान् कालयानो वृकोदरम् ॥ २५ ॥ उस समय वह हाथी तुरंत ही कुम्हारके चाकके समान सब ओर घूमने लगा। उसमें दस हजार हाथियोंका बल था। वह शोभायमान गजराज भीमसेनको मार डालनेका प्रयत्न कर रहा था ।। २५ ।।
भीमोऽपि निष्क्रम्य ततः सुप्रतीकाग्रतोऽभवत् । भीमं करेणावनम्य जानुभ्यामभ्यताडयत् ॥ २६ ॥ भीमसेन भी उसके शरीरके नीचेसे निकलकर उस हाथीके सामने खड़े हो गये। उस समय हाथीने अपनी सूँड़से गिराकर उन्हें दोनों घुटनोंसे कुचल डालनेका प्रयत्न किया ।।
ग्रीवायां वेष्टयित्वैनं स गजो हन्तुमैहत । करवेष्टं भीमसेनो भ्रमं दत्त्वा व्यमोचयत् ॥ २७ ॥