भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 228

इतना ही नहीं, उस हाथीने उन्हें गलेमें लपेटकर मार डालनेकी चेष्टा की। तब भीमसेन उसे भ्रममें डालकर उसकी सूँड़के लपेटसे अपने-आपको छुड़ा लिया॥ २७॥

पुनर्गात्राणि नागस्य प्रविवेश वृकोदरः।
यावत् प्रतिगजायातं स्वबले प्रत्यवैक्षत ॥ २८ ॥
तदनन्तर भीमसेन पुनः उस हाथीके शरीरमें ही छिप गये और अपनी सेनाकी ओरसे उस हाथीका सामना करनेके लिये किसी दूसरे हाथीके आगमनकी प्रतीक्षा करने लगे ॥ २८ ॥

भीमोऽपि नागगात्रेभ्यो विनिःसृत्यापयाज्जवात् ।
ततः सर्वस्य सैन्यस्य नादः समभवन्महान् ॥ २९ ॥
थोड़ी देर बाद भीम हाथीके शरीरसे निकलकर बड़े वेगसे भाग गये। उस समय सारी सेनामें बड़े जोरसे कोलाहल होने लगा ॥ २९ ॥

अहो धिङ् निहतो भीमः कुञ्जरेणेति मारिष।
तेन नागेन संत्रस्ता पाण्डवानामनीकिनी ॥ ३० ॥
सहसाभ्यद्रवद् राजन् यत्र तस्थौ वृकोदरः ।
आर्य! उस समय सबके मुँहसे यही बात निकल रही थी—'अहो! इस हाथीने भीमसेनको मार डाला, यह कितनी बुरी बात है!' राजन्! उस हाथीसे भयभीत हो पाण्डवोंकी सारी सेना सहसा वहीं भाग गयी, जहाँ भीमसेन खड़े थे ॥ ३० ½ ॥

ततो युधिष्ठिरो राजा हतं मत्वा वृकोदरम् ॥ ३१ ॥
भगदत्तं सपाञ्चाल्यः सर्वतः समवारयत्।
तब राजा युधिष्ठिरने भीमसेनको मारा गया जानकर पांचालदेशीय सैनिकोंको साथ ले भगदत्तको चारों ओरसे घेर लिया ॥ ३१ ½ ॥

तं रथं रथिनां श्रेष्ठाः परिवार्य परंतपाः ॥ ३२ ॥
अवाकिरन् शरैस्तीक्ष्णैः शतशोऽथ सहस्रशः ।
शत्रुओंको संताप देनेवाले वे श्रेष्ठ रथी उन महारथी भगदत्तको सब ओरसे घेरकर उनके ऊपर सैकड़ों और हजारों पैने बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ ३२ ½ ॥

स विघातं पृषत्कानामङ्कुशेन समाहरन् ॥ ३३ ॥
गजेन पाण्डुपाञ्चालान् व्यधमत् पर्वतेश्वरः ।
पर्वतराज भगदत्तने उन बाणोंके प्रहारका अंकुशद्वारा निवारण किया और हाथीको आगे बढ़ाकर पाण्डव तथा पांचाल योद्धाओंको कुचल डाला ॥ ३३ ½ ॥

तदद्भुतमपश्याम भगदत्तस्य संयुगे ॥ ३४ ॥
तथा वृद्धस्य चरितं कुञ्जरेण विशाम्पते ।