महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रजानाथ! उस युद्धस्थलमें हाथीके द्वारा बूढ़े राजा भगदत्तका हमलोगोंने अद्भुत पराक्रम देखा ।। ३४ १/२ ।।
ततो राजा दशार्णानां प्राग्ज्योतिषमुपाद्रवत् ।। ३५ ।।
तिर्यग्जातेन नागेन समदेनाशुगामिना ।
तत्पश्चात् दशार्णराजने मदस्रावी, शीघ्रगामी तथा तिरछी दिशा (पार्श्वभाग)-की ओरसे आक्रमण करनेवाले गजराजके द्वारा भगदत्तपर धावा किया ।।
तयोर्युद्धं समभवन्नागयोर्भीमरूपयोः ।। ३६ ।।
सपक्षयोः पर्वतयोर्यथा सद्रुमयोः पुरा ।
वे दोनों हाथी बड़े भयंकर रूपवाले थे। उन दोनोंका युद्ध वैसा ही प्रतीत हुआ, जैसा कि पूर्वकालमें पंखयुक्त एवं वृक्षावलीसे विभूषित दो पर्वतोंमें युद्ध हुआ करता था ।। ३६ १/२ ।।
प्राग्ज्योतिषपतेर्नागः संनिवृत्यापसृत्य च ।। ३७ ।।
पार्श्वे दशार्णाधिपतेर्भित्त्वा नागमपातयत् ।
प्राग्ज्योतिषनरेशके हाथीने लौटकर और पीछे हटकर दशार्णराजके हाथीके पार्श्वभागमें गहरा आघात किया और उसे विदीर्ण करके मार गिराया ।। ३७ १/२ ।।
तोमरैः सूर्यरश्म्याभैर्भगदत्तोऽथ सप्तभिः ।। ३८ ।।
जघान द्विरदस्थं तं शत्रुं प्रचलितासनम् ।
तत्पश्चात् राजा भगदत्तने सूर्यकी किरणोंके समान चमकीले सात तोमरोंद्वारा हाथीपर बैठे हुए शत्रु दशार्णराजको, जिसका आसन विचलित हो गया था, मार डाला ।। ३८ १/२ ।।
व्यवच्छिद्य तु राजानं भगदत्तं युधिष्ठिरः ।। ३९ ।।
रथानीकेन महता सर्वतः पर्यवारयत् ।
तब युधिष्ठिरने राजा भगदत्तको अपने बाणोंसे घायल करके विशाल रथसेनाके द्वारा सब ओरसे घेर लिया ।। ३९ १/२ ।।
स कुञ्जरस्थो रथिभिः शुशुभे सर्वतो वृतः ।। ४० ।।
पर्वते वनमध्यस्थो ज्वलन्निव हुताशनः ।
जैसे वनके भीतर पर्वतके शिखरपर दावानल प्रज्वलित हो रहा हो, उसी प्रकार सब ओर रथियोंसे घिरकर हाथीकी पीठपर बैठे हुए राजा भगदत्त सुशोभित हो रहे थे ।। ४० १/२ ।।
मण्डलं सर्वतः श्लिष्टं रथिनामुग्रधन्विनाम् ।। ४१ ।।
किरतां शरवर्षाणि स नागः पर्यवर्तत ।
बाणोंकी वर्षा करते हुए भयंकर धनुर्धर रथियोंका मण्डल उस हाथीपर सब ओरसे आक्रमण कर रहा था और वह हाथी चारों ओर चक्कर काट रहा था ।। ४१ १/२ ।।