भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 230

ततः प्राग्ज्योतिषो राजा परिगृह्य महागजम् ॥ ४२ ॥
प्रेषयामास सहसा युयुधानरथं प्रति ।
उस समय प्राग्ज्योतिषपुरके राजाने उस महान् गजराजको सब ओरसे काबूमें करके सहसा सात्यकिके रथकी ओर बढ़ाया ॥ ४२ १/२ ॥
शिनेः पौत्रस्य तु रथं परिगृह्य महाद्विपः ॥ ४३ ॥
अभिचिक्षेप वेगेन युयुधानस्त्वपाक्रमत् ।
युयुधान (सात्यकि) अपने रथको छोड़कर दूर हट गये और उस महान् गजराजने शिनिपौत्र सात्यकिके उस रथको सूँडसे पकड़कर बड़े वेगसे फेंक दिया ॥ ४३ १/२ ॥
बृहतः सैन्धवानश्वान् समुत्थाप्याथ सारथिः ॥ ४४ ॥
तस्थौ सात्यकिमासाद्य सम्प्लुतस्तं रथं प्रति ।
तदनन्तर सारथिने अपने रथके विशाल सिंधी घोड़ोंको उठाकर खड़ा किया और कूदकर रथपर जा चढ़ा। फिर रथसहित सात्यकिके पास जाकर खड़ा हो गया ॥ ४४ १/२ ॥
स तु लब्ध्वान्तरं नागस्त्वरितो रथमण्डलात् ॥ ४५ ॥
निश्चक्राम ततः सर्वान् परिचिक्षेप पार्थिवान् ।
इसी बीचमें अवसर पाकर वह गजराज बड़ी उतावलीके साथ रथोंके घेरेसे पार निकल गया और समस्त राजाओंको उठा-उठाकर फेंकने लगा ॥ ४५ १/२ ॥
ते त्वाशुगतिना तेन त्रास्यमाना नरर्षभाः ॥ ४६ ॥
तमेकं द्विरदं संख्ये मेनिरे शतशो द्विपान् ।
उस शीघ्रगामी गजराजसे डराये हुए नरश्रेष्ठ नरेश युद्धस्थलमें उस एकको ही सैकड़ों हाथियोंके समान मानने लगे ॥ ४६ १/२ ॥
ते गजस्थेन काल्यन्ते भगदत्तेन पाण्डवाः ॥ ४७ ॥
ऐरावतस्थेन यथा देवराजेन दानवाः ।
जैसे देवराज इन्द्र ऐरावत हाथीपर बैठकर दानवोंका नाश करते हैं, उसी प्रकार अपने हाथीकी पीठपर बैठे हुए राजा भगदत्त पाण्डव-सैनिकोंका संहार कर रहे थे ॥ ४७ १/२ ॥
तेषां प्रद्रवतां भीमः पञ्चालानामितस्ततः ॥ ४८ ॥
गजवाजिकृतः शब्दः सुमहान् समजायत ।
उस समय इधर-उधर भागते हुए पांचाल-सैनिकोंके हाथी-घोड़ोंका महान् भयंकर चीत्कार शब्द प्रकट हुआ ॥ ४८ १/२ ॥
भगदत्तेन समरे काल्यमानेषु पाण्डुषु ॥ ४९ ॥
प्राग्ज्योतिषमभिक्रुद्धः पुनर्भीमः समभ्ययात् ।
भगदत्तके द्वारा समरभूमिमें पाण्डव-सैनिकोंके खदेड़े जानेपर भीमसेन कुपित हो पुनः प्राग्ज्योतिषके स्वामी भगदत्तपर चढ़ आये ॥ ४९ १/२ ॥