महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 231, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंतस्याभिद्रवतो वाहान् हस्तमुक्तेन वारिणा ।। ५० ।। सिक्त्वा व्यत्रासयन्नागस्ते पार्थमहरंस्ततः । उस समय आक्रमण करनेवाले भीमसेनके घोड़ोंपर उस हाथीने सूँड़से जल छोड़कर उन्हें भयभीत कर दिया। फिर तो वे घोड़े भीमसेनको लेकर दूर भाग गये ।। ५० १/२ ।। ततस्तमभ्ययात् तूर्णं रुचिपर्वाऽऽकृतीसुतः ।। ५१ ।। समघ्नञ्छरवर्षेण रथस्थोऽन्तकसंनिभः । तब आकृतीपुत्र रुचिपर्वाने तुरंत ही उस हाथीपर आक्रमण किया। वह रथपर बैठकर साक्षात् यमराजके समान जान पड़ता था। उसने बाणोंकी वर्षासे उस हाथीको गहरी चोट पहुँचायी ।। ५१ १/२ ।। ततः स रुचिपर्वाणं शरेणानतपर्वणा ।। ५२ ।। सुपर्वा पर्वतपतिर्निन्ये वैवस्वतक्षयम् । यह देख जिनके अंगोंकी जोड़ सुन्दर है उन पर्वतराज भगदत्तने झुकी हुई गाँठवाले बाणके द्वारा रुचिपर्वाको यमलोक पहुँचा दिया ।। ५२ १/२ ।। तस्मिन् निपतिते वीरे सौभद्रो द्रौपदीसुतः ।। ५३ ।। चेकितानो धृष्टकेतुर्युयुत्सुश्चार्दयन् द्विपम् । त एनं शरधाराभिर्धाराभिरिव तोयदाः ।। ५४ ।। सिषिचुर्भैरवान् नादान् विनदन्तो जिघांसवः । उस वीरके मारे जानेपर अभिमन्यु, द्रौपदीकुमार, चेकितान, धृष्टकेतु तथा युयुत्सुने भी उस हाथीको पीड़ा देना आरम्भ किया। ये सब लोग उस हाथीको मार डालनेकी इच्छासे विकट गर्जना करते हुए अपने बाणोंकी धारासे सींचने लगे, मानो मेघ पर्वतको जलकी धारासे नहला रहे हों ।। ५३-५४ १/२ ।। ततः पाष्र्ण्यङ्कुशाङ्गुष्ठैः कृतिना चोदितो द्विपः ।। ५५ ।। प्रसारितकरः प्रायात् स्तब्धकर्णेक्षणो द्रुतम् । सोऽधिष्ठाय पदा वाहान् युयुत्सोः सूतमरुजत् ।। ५६ ।। तदनन्तर विद्वान् राजा भगदत्तने अपने पैरोंकी एँड़ी, अंकुश एवं अंगुष्ठसे प्रेरित करके हाथीको आगे बढ़ाया। फिर तो अपने कानोंको खड़े करके एकटक आँखोंसे देखते हुए सूँड़ फैलाकर उस हाथीने शीघ्रतापूर्वक धावा किया और युयुत्सुके घोड़ोंको पैरोंसे दबाकर उनके सारथिको मार डाला ।। ५५-५६ ।। युयुत्सुस्तु रथाद् राजन्नपाक्रामत् त्वरान्वितः । ततः पाण्डवयोधास्ते नागराजं शरैर्द्रुतम् ।। ५७ ।। सिषिचुर्भैरवान् नादान् विनदन्तो जिघांसवः ।