महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
तस्याभिद्रवतो वाहान् हस्तमुक्तेन वारिणा ।। ५० ।। सिक्त्वा व्यत्रासयन्नागस्ते पार्थमहरंस्ततः । उस समय आक्रमण करनेवाले भीमसेनके घोड़ोंपर उस हाथीने सूँड़से जल छोड़कर उन्हें भयभीत कर दिया। फिर तो वे घोड़े भीमसेनको लेकर दूर भाग गये ।। ५० १/२ ।। ततस्तमभ्ययात् तूर्णं रुचिपर्वाऽऽकृतीसुतः ।। ५१ ।। समघ्नञ्छरवर्षेण रथस्थोऽन्तकसंनिभः । तब आकृतीपुत्र रुचिपर्वाने तुरंत ही उस हाथीपर आक्रमण किया। वह रथपर बैठकर साक्षात् यमराजके समान जान पड़ता था। उसने बाणोंकी वर्षासे उस हाथीको गहरी चोट पहुँचायी ।। ५१ १/२ ।। ततः स रुचिपर्वाणं शरेणानतपर्वणा ।। ५२ ।। सुपर्वा पर्वतपतिर्निन्ये वैवस्वतक्षयम् । यह देख जिनके अंगोंकी जोड़ सुन्दर है उन पर्वतराज भगदत्तने झुकी हुई गाँठवाले बाणके द्वारा रुचिपर्वाको यमलोक पहुँचा दिया ।। ५२ १/२ ।। तस्मिन् निपतिते वीरे सौभद्रो द्रौपदीसुतः ।। ५३ ।। चेकितानो धृष्टकेतुर्युयुत्सुश्चार्दयन् द्विपम् । त एनं शरधाराभिर्धाराभिरिव तोयदाः ।। ५४ ।। सिषिचुर्भैरवान् नादान् विनदन्तो जिघांसवः । उस वीरके मारे जानेपर अभिमन्यु, द्रौपदीकुमार, चेकितान, धृष्टकेतु तथा युयुत्सुने भी उस हाथीको पीड़ा देना आरम्भ किया। ये सब लोग उस हाथीको मार डालनेकी इच्छासे विकट गर्जना करते हुए अपने बाणोंकी धारासे सींचने लगे, मानो मेघ पर्वतको जलकी धारासे नहला रहे हों ।। ५३-५४ १/२ ।। ततः पाष्र्ण्यङ्कुशाङ्गुष्ठैः कृतिना चोदितो द्विपः ।। ५५ ।। प्रसारितकरः प्रायात् स्तब्धकर्णेक्षणो द्रुतम् । सोऽधिष्ठाय पदा वाहान् युयुत्सोः सूतमरुजत् ।। ५६ ।। तदनन्तर विद्वान् राजा भगदत्तने अपने पैरोंकी एँड़ी, अंकुश एवं अंगुष्ठसे प्रेरित करके हाथीको आगे बढ़ाया। फिर तो अपने कानोंको खड़े करके एकटक आँखोंसे देखते हुए सूँड़ फैलाकर उस हाथीने शीघ्रतापूर्वक धावा किया और युयुत्सुके घोड़ोंको पैरोंसे दबाकर उनके सारथिको मार डाला ।। ५५-५६ ।। युयुत्सुस्तु रथाद् राजन्नपाक्रामत् त्वरान्वितः । ततः पाण्डवयोधास्ते नागराजं शरैर्द्रुतम् ।। ५७ ।। सिषिचुर्भैरवान् नादान् विनदन्तो जिघांसवः ।
राजन्! युयुत्सु बड़ी उतावलीके साथ रथसे उतरकर दूर चले गये थे। तत्पश्चात् पाण्डव-योद्धा उस गजराजको शीघ्रतापूर्वक मार डालनेकी इच्छासे भैरव-गर्जना करते हुए अपने बाणोंकी वर्षाद्वारा उसे सींचने लगे ॥ ५७ १/२ ॥
पुत्रस्तु तव सम्भ्रान्तः सौभद्रस्याप्लुतो रथम् ॥ ५८ ॥
स कुञ्जरस्थो विसृजन्निक्षूनरिषु पार्थिवः ।
बभौ रश्मीनिवादित्यो भुवनेषु समुत्सृजन् ॥ ५९ ॥
उस समय घबराये हुए आपके पुत्र युयुत्सु अभिमन्युके रथपर जा बैठे। हाथीकी पीठपर बैठे हुए राजा भगदत्त शत्रुओंपर बाण-वर्षा करते हुए सम्पूर्ण लोकोंमें अपनी किरणोंका विस्तार करनेवाले सूर्यके समान शोभा पा रहे थे ॥ ५८-५९ ॥
तमार्जुनिर्द्वादशभिर्युयुत्सुर्दशभिः शरैः ।
त्रिभिस्त्रिभिर्द्रौपदेया धृष्टकेतुश्च विव्यधुः ॥ ६० ॥
अर्जुनकुमार अभिमन्युने बारह, युयुत्सुने दस और द्रौपदीके पुत्रों तथा धृष्टकेतुने तीन-तीन बाणोंसे भगदत्तके उस हाथीको घायल कर दिया ॥ ६० ॥
सोऽतियत्नार्पितैर्बाणैराचितो द्विरदो बभौ ।
संस्यूत इव सूर्यस्य रश्मिभिर्जलदो महान् ॥ ६१ ॥
अत्यन्त प्रयत्नपूर्वक चलाये हुए उन बाणोंसे हाथीका सारा शरीर व्याप्त हो रहा था। उस अवस्थामें वह सूर्यकी किरणोंमें पिरोये हुए महामेघके समान शोभा पा रहा था ॥ ६१ ॥
नियन्तुः शिल्पयत्नाभ्यां प्रेरितोऽरिशरार्दितः ।
परिचिक्षेप तान् नागः स रिपून् सव्यदक्षिणम् ॥ ६२ ॥
महावतके कौशल और प्रयत्नसे प्रेरित होकर वह हाथी शत्रुओंके बाणोंसे पीड़ित होनेपर भी उन विपक्षियोंको दायें-बायें उठाकर फेंकने लगा ॥ ६२ ॥
गोपाल इव दण्डेन यथा पशुगणान् वने ।
आवेष्टयत तां सेनां भगदत्तस्तथा मुहुः ॥ ६३ ॥
जैसे ग्वाला जंगलमें पशुओंको डंडेसे हाँकता है, उसी प्रकार भगदत्तने पाण्डव-सेनाको बार-बार घेर लिया ॥ ६३ ॥
क्षिप्रं श्येनाभिपन्नानां वायसानामिव स्वनः ।
बभूव पाण्डवेयानां भृशं विद्रवतां स्वनः ॥ ६४ ॥
जैसे बाज पक्षीके चंगुलमें फँसे हुए अथवा उसके आक्रमणसे त्रस्त हुए कौओंमें शीघ्र ही काँव-काँवका कोलाहल होने लगता है, उसी प्रकार भागते हुए पाण्डव योद्धाओंका आर्तनाद जोर-जोरसे सुनायी दे रहा था ॥ ६४ ॥
स नागराजः प्रवराङ्कुशाहतः
पुरा सपक्षोऽद्रिवरो यथा नृप ।
भयं तदा रिपुषु समादधद् भृशं वणिग्जनानां क्षुभितो यथार्णवः ॥ ६५ ॥ नरेश्वर! उस समय विशाल अंकुशकी मार खाकर वह गजराज पूर्वकालके पंखधारी श्रेष्ठ पर्वतकी भाँति शत्रुओंको उसी प्रकार अत्यन्त भयभीत करने लगा, जैसे विक्षुब्ध महासागर व्यापारियोंको भयमें डाल देता है ॥ ६५ ॥
ततो ध्वनिर्दिरदरथाश्वपार्थिवै- र्भयाद् द्रवद्भिर्जनितोऽतिभैरवः । क्षितिं वियद् द्यां विदिशो दिशस्तथा समावृणोत् पार्थिव संयुगे ततः ॥ ६६ ॥ महाराज! तदनन्तर भयसे भागते हुए हाथी, रथ, घोड़े तथा राजाओंने वहाँ अत्यन्त भयंकर आर्तनाद फैला दिया। उनके उस भयंकर शब्दने युद्धस्थलमें पृथ्वी, आकाश, स्वर्ग तथा दिशा-विदिशाओंको सब ओरसे आच्छादित कर दिया ॥ ६६ ॥
स तेन नागप्रवरेण पार्थिवो भृशं जगाहे द्विषतामनीकिनीम् । पुरा सुगुप्तां विबुधैरिवाहवे विरोचनो देववरूथिनीमिव ॥ ६७ ॥ उस गजराजके द्वारा राजा भगदत्तने शत्रुओंकी सेनामें अच्छी तरह प्रवेश किया। जैसे पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके समय देवताओंद्वारा सुरक्षित देव-सेनामें विरोचनने प्रवेश किया था ॥ ६७ ॥
भृशं ववौ ज्वलनसखो वियद् रजः समावृणोन्मुहुरपि चैव सैनिकान् । तमेकनागं गणशो यथा गजान् समन्ततो द्रुतमथ मेनिरे जनाः ॥ ६८ ॥ उस समय वहाँ बड़े जोरसे वायु चलने लगी। आकाशमें धूल छा गयी। उस धूलने समस्त सैनिकोंको ढक दिया। उस समय सब लोग चारों ओर दौड़ लगानेवाले उस एकमात्र हाथीको हाथियोंके झुंड-सा मानने लगे ॥ ६८ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि संशप्तकवधपर्वणि भगदत्तयुद्धे षड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत संशप्तकवधपर्वमें भगदत्तका युद्धविषयक छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६ ॥
*— हाथीके निचले भागमें कोई ऐसा स्थान होता है, जिसमें दोनों हाथोंके द्वारा थपथपानेसे हाथीको सुख मिलता है। इस अवस्थामें वह महावतके मारनेपर भी टस-से-मस नहीं होता। भीमसेन इस कलाको जानते थे। इसीका नाम ‘अंजलिकावेध’ है।
सप्तविंशोऽध्यायः
अर्जुनका संशप्तक-सेनाके साथ भयंकर युद्ध और उसके अधिकांश भागका वध
संजय उवाच
यन्मां पार्थस्य संग्रामे कर्माणि परिपृच्छसि ।
तच्छृणुष्व महाबाहो पार्थो यदकरोद् रणे ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— महाबाहो! आप जो मुझसे युद्धमें अर्जुनके पराक्रम पूछ रहे हैं, उन्हें बताता हूँ। अर्जुनने रणक्षेत्रमें जो कुछ किया था, वह सुनिये ॥ १ ॥
रजो दृष्ट्वा समुद्भूतं श्रुत्वा च गजनिःस्वनम् ।
भगदत्ते विकुर्वाणे कौन्तेयः कृष्णमब्रवीत् ॥ २ ॥
भगदत्तके विचित्र रूपसे युद्ध करते समय वहाँ धूल उड़ती देखकर और हाथीके चिग्घाड़नेका शब्द सुनकर कुन्तीनन्दन अर्जुनने श्रीकृष्णसे कहा— ॥ २ ॥
यथा प्राग्ज्योतिषो राजा गजेन मधुसूदन ।
त्वरमाणो विनिष्क्रान्तो ध्रुवं तस्यैष निःस्वनः ॥ ३ ॥
‘मधुसूदन! राजा भगदत्त अपने हाथीपर सवार जिस प्रकार उतावलीके साथ युद्धके लिये निकले थे, उससे जान पड़ता है निश्चय ही यह महान् कोलाहल उन्हींका है ॥ ३ ॥
इन्द्रादनवरः संख्ये गजयानविशारदः ।
प्रथमो गजयोधानां पृथिव्यामिति मे मतिः ॥ ४ ॥
‘मेरा तो यह विश्वास है कि वे युद्धमें इन्द्रसे कम नहीं है। भगदत्त हाथीकी सवारीमें कुशल और गजारोही योद्धाओंमें इस पृथ्वीपर सबसे प्रधान हैं ॥ ४ ॥
स चापि द्विरदश्रेष्ठः सदाऽप्रतिगजो युधि ।
सर्वशस्त्रातिगः संख्ये कृतकर्मा जितक्लमः ॥ ५ ॥
‘और उनका वह गजश्रेष्ठ सुप्रतीक भी युद्धमें अपना शानी नहीं रखता है। वह सब शास्त्रोंका उल्लंघन करके युद्धमें अनेक बार पराक्रम प्रकट कर चुका है। उसने परिश्रमको जीत लिया है ॥ ५ ॥
सहः शस्त्रनिपातानामग्निस্পর্শस्य चानघ ।
स पाण्डवबलं सर्वमद्यैको नाशयिष्यति ॥ ६ ॥
‘अनघ! वह सम्पूर्ण शस्त्रोंके आघात तथा अग्निके स्पर्शको भी सह सकनेवाला है। आज वह अकेला ही समस्त पाण्डव-सेनाका विनाश कर डालेगा ॥ ६ ॥
न चावाभ्यामृतेऽन्योऽस्ति शक्तस्तं प्रतिबाधितुम् ।
त्वरमाणस्ततो याहि यतः प्राग्ज्योतिषाधिपः ॥ ७ ॥
'हम दोनोंके सिवा दूसरा कोई नहीं है, जो उसे बाधा देनेमें समर्थ हो। अतः आप शीघ्रतापूर्वक वहीं चलिये, जहाँ प्राग्ज्योतिषनरेश भगदत्त विद्यमान हैं' ॥ ७ ॥
दृप्तं संख्ये द्विपबलाद् वयसा चापि विस्मितम् ।
अद्यैनं प्रेषयिष्यामि बलहन्तुः प्रियातिथिम् ॥ ८ ॥
'अपने हाथीके बलसे युद्धमें घमंड दिखानेवाले और अवस्थामें भी बड़े होनेका अहंकार रखनेवाले इन राजा भगदत्तको मैं देवराज इन्द्रका प्रिय अतिथि बनाकर स्वर्गलोक भेज दूँगा' ॥ ८ ॥
वचनादथ कृष्णस्तु प्रययौ सव्यसाचिनः ।
दीर्यते भगदत्तेन यत्र पाण्डववाहिनी ॥ ९ ॥
सव्यसाची अर्जुनके इस वचनसे प्रेरित हो श्रीकृष्ण उस स्थानपर रथ लेकर गये, जहाँ भगदत्त पाण्डव-सेनाका संहार कर रहे थे ॥ ९ ॥
तं प्रयान्तं ततः पश्चादाह्वयन्तो महारथाः ।
संशप्तकाः समारोहन् सहस्राणि चतुर्दश ॥ १० ॥
अर्जुनको जाते देख पीछेसे चौदह हजार संशप्तक महारथी उन्हें ललकारते हुए चढ़ आये ॥ १० ॥
दशैव तु सहस्राणि त्रिगर्तानां महारथाः ।
चत्वारि च सहस्राणि वासुदेवस्य चानुगाः ॥ ११ ॥
उनमें दस हजार महारथी तो त्रिगर्तदेशके थे और चार हजार भगवान् श्रीकृष्णके सेवक (नारायणी-सेनाके सैनिक) थे ॥ ११ ॥
दीर्यमाणां चमूं दृष्ट्वा भगदत्तेन मारिष ।
आहूयमानस्य च तैरभवद्धृदयं द्विधा ॥ १२ ॥
आर्य! राजा भगदत्तके द्वारा अपनी सेनाको विदीर्ण होती देखकर तथा पीछेसे संशप्तकोंकी ललकार सुनकर उनका हृदय दुविधामें पड़ गया ॥ १२ ॥
किं नु श्रेयस्करं कर्म भवेदद्येति चिन्तयन् ।
इह वा विनिवर्तेयं गच्छेयं वा युधिष्ठिरम् ॥ १३ ॥
वे सोचने लगे—आज मेरे लिये कौन-सा कार्य श्रेयस्कर होगा। यहाँसे संशप्तकोंकी ओर लौट चलूँ अथवा युधिष्ठिरके पास जाऊँ ॥ १३ ॥
तस्य बुद्ध्या विचार्यैवमर्जुनस्य कुरूद्वह ।
अभवद् भूयसी बुद्धिः संशप्तकवधे स्थिरा ॥ १४ ॥
कुरुश्रेष्ठ! बुद्धिसे इस प्रकार विचार करनेपर अर्जुनके मनमें यह भाव अत्यन्त दृढ़ हुआ कि संशप्तकोंके वधका ही प्रयत्न करना चाहिये ॥ १४ ॥
स संनिवृत्तः सहसा कपिप्रवरकेतनः ।
एको रथसहस्राणि निहन्तुं वासवी रणे ॥ १५ ॥
श्रेष्ठ वानरचिह्नसे सुशोभित ध्वजावाले इन्द्रकुमार अर्जुन उपर्युक्त बात सोचकर सहसा लौट पड़े। वे रणक्षेत्रमें अकेले ही हजारों रथियोंका संहार करनेको उद्यत थे ॥ १५ ॥
सा हि दुर्योधनस्यासीन्मतिः कर्णस्य चोभयोः ।
अर्जुनस्य वधोपाये तेन द्वैधमकल्पयत् ॥ १६ ॥
अर्जुनके वधका उपाय सोचते हुए दुर्योधन और कर्ण दोनोंके मनमें यही विचार उत्पन्न हुआ था। इसीलिये उसने युद्धको दो भागोंमें बाँट दिया ॥ १६ ॥
स तु दोलायमानोऽभूद् द्वैधीभावेन पाण्डवः ।
वधेन तु नराग्र्याणामकरोत् तां मृषा तदा ॥ १७ ॥
पाण्डुनन्दन अर्जुन एक बार दुविधामें पड़कर चंचल हो गये थे, तथापि नरश्रेष्ठ संशप्तक वीरोंके वधका निश्चय करके उन्होंने उस दुविधाको मिथ्या कर दिया था ॥ १७ ॥
ततः शतसहस्राणि शराणां नतपर्वणाम् ।
असृजन्नर्जुने राजन् संशप्तकमहारथाः ॥ १८ ॥
राजन्! तदनन्तर संशप्तक महारथियोंने अर्जुनपर झुकी हुई गाँठवाले एक लाख बाणोंकी वर्षा की ॥ १८ ॥
नैव कुन्तीसुतः पार्थो नैव कृष्णो जनार्दनः ।
न हया न रथो राजन् दृश्यन्ते स्म शरैश्चिताः ॥ १९ ॥
महाराज! उस समय न तो कुन्तीकुमार अर्जुन, न जनार्दन श्रीकृष्ण, न घोड़े और न रथ ही दिखायी देते थे। सब-के-सब वहाँ बाणोंके ढेरसे आच्छादित हो गये थे ॥ १९ ॥
तदा मोहमनुप्राप्तः सिष्विदे हि जनार्दनः ।
ततस्तान् प्रायशः पार्थो ब्रह्मास्त्रेण निजघ्निवान् ॥ २० ॥
उस अवस्थामें भगवान् जनार्दन पसीने-पसीने हो गये। उनपर मोह-सा छा गया। यह देख अर्जुनने ब्रह्मास्त्रसे उन सबको अधिकांशमें नष्ट कर दिया ॥ २० ॥
शतशः पाणयश्छिन्नाः सेषुज्यातालकार्मुकाः ।
केतवो वाजिनः सूता रथिनश्चापतन् क्षितौ ॥ २१ ॥
सैकड़ों भुजाएँ बाण, प्रत्यंचा और धनुषसहित कट गयीं। ध्वज, घोड़े, सारथि और रथी सभी धराशायी हो गये ॥ २१ ॥
द्रुमाचलाग्राम्बुधरैः समकायाः सुकल्पिताः ।
हतारोहाः क्षितौ पेतुर्द्विपाः पार्थशराहताः ॥ २२ ॥
वृक्ष, पर्वत-शिखर और मेघोंके समान विशाल एवं ऊँचे शरीरवाले, सजे-सजाये हाथी, जिनके सवार पहले ही मार दिये गये थे, अर्जुनके बाणोंसे आहत होकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ २२ ॥
विप्रविद्धकुथा नागाश्छिन्नभाण्डाः परासवः ।
सारोहास्तु रणे पेतुर्मथिता मार्गणैर्भृशम् ॥ २३ ॥ उस रणक्षेत्रमें बहुत-से हाथी अर्जुनके बाणोंसे मथित होकर सवारोंसहित प्राणशून्य होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। उस समय उनके झूल चिथड़े-चिथड़े होकर दूर जा पड़े थे और उनके आभूषणोंके भी टुकड़े-टुकड़े हो गये थे॥ २३ ॥
सर्ष्टिप्रासासिनखराः समुद्गरपरश्वधाः । विच्छिन्ना बाहवः पेतुर्नॄणां भल्लैः किरीटिना ॥ २४ ॥ किरीटधारी अर्जुनके भल्लनामक बाणोंसे ऋष्टि, प्रास, खड्ग, नखर, मुद्गर और फरसोंसहित वीरोंकी भुजाएँ कटकर गिर गयीं ॥ २४ ॥
बालादित्याम्बुजेन्दूनां तुल्यरूपाणि मारिष । संच्छिन्नान्यर्जुनशरैः शिरांस्युर्व्यां प्रपेदिरे ॥ २५ ॥ आर्य! योद्धाओंके मस्तक, जो बालसूर्य, कमल और चन्द्रमाके समान सुन्दर थे, अर्जुनके बाणोंसे छिन्न-भिन्न हो पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ २५ ॥
जज्वालालंकृता सेना पत्रिभिः प्राणिभोजनैः । नानारूपैस्तदामित्रान् क्रुद्धे निघ्नति फाल्गुने ॥ २६ ॥ जब क्रोधमें भरे हुए अर्जुन नाना प्रकारके प्राणनाशक बाणोंद्वारा शत्रुओंका नाश करने लगे, उस समय आभूषणोंसे विभूषित हुई संशप्तकोंकी सारी सेना जलने लगी ॥ २६ ॥
क्षोभयन्तं तदा सेनां द्विरदं नलिनीमिव । धनंजयं भूतगणाः साधु साध्वित्यपूजयन् ॥ २७ ॥ जैसे हाथी कमलोंसे भरे हुए सरोवरको मथ डालता है, उसी प्रकार अर्जुनको सारी सेनाका विनाश करते देख सब प्राणी 'साधु-साधु' कहकर अर्जुनकी प्रशंसा करने लगे ॥ २७ ॥
दृष्ट्वा तत् कर्म पार्थस्य वासवस्येव माधवः । विस्मयं परमं गत्वा प्राञ्जलिस्तमुवाच ह ॥ २८ ॥ इन्द्रके समान अर्जुनका वह पराक्रम देख भगवान् श्रीकृष्ण अत्यन्त आश्चर्यमें पड़कर हाथ जोड़े हुए बोले— ॥ २८ ॥
कर्मैतत् पार्थ शक्रेण यमेन धनदेन च । दुष्करं समरे यत् ते कृतमद्येति मे मतिः ॥ २९ ॥ 'पार्थ! मेरा ऐसा विश्वास है कि आज समर-भूमिमें तुमने जो कार्य किया है, यह इन्द्र, यम और कुबेरके लिये भी दुष्कर है ॥ २९ ॥
युगपच्चैव संग्रामे शतशोऽथ सहस्रशः । पतिता एव मे दृष्टाः संशप्तकमहारथाः ॥ ३० ॥ 'इस संग्राममें मैंने सैकड़ों और हजारों संशप्तक महारथियोंको एक साथ ही गिरते देखा है' ॥ ३० ॥
संशप्तकांस्ततो हत्वा भूयिष्ठा ये व्यवस्थिताः । भगदत्ताय याहीति कृष्णं पार्थोऽभ्यनोदयत् ॥ ३१ ॥ इस प्रकार वहाँ खड़े हुए संशप्तक योद्धाओंमेंसे अधिकांशका वध करके अर्जुनने भगवान् श्रीकृष्णसे कहा—'अब भगदत्तके पास चलिये' ॥ ३१ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि संशप्तकवधपर्वणि संशप्तकवधे सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत संशप्तकवधपर्वमें संशप्तकोंका वधविषयक सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७ ॥
अष्टाविंशोऽध्यायः
संशप्तकोंका संहार करके अर्जुनका कौरव-सेनापर आक्रमण तथा भगदत्त और उनके हाथीका पराक्रम
संजय उवाच
यियासतस्ततः कृष्णः पार्थस्याश्वान् मनोजवान् ।
सम्प्रेषीद्धेमसंछन्नान् द्रोणानीकाय सत्वरन् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— महाराज! तदनन्तर द्रोणकी सेनाके समीप जानेकी इच्छावाले अर्जुनके सुवर्णभूषित एवं मनके समान वेगशाली अश्वोंको भगवान् श्रीकृष्णने बड़ी उतावलीके साथ द्रोणाचार्यकी सेनातक पहुँचनेके लिये हाँका ॥ १ ॥
तं प्रयान्तं कुरुश्रेष्ठं स्वान् भ्रातॄन् द्रोणतापितान् ।
सुशर्मा भ्रातृभिः सार्धं युद्धार्थी पृष्ठतोऽन्वयात् ॥ २ ॥
द्रोणाचार्यके सताये हुए अपने भाइयोंके पास जाते हुए कुरुश्रेष्ठ अर्जुनको भाइयोंसहित सुशर्माने युद्धकी इच्छासे ललकारा और पीछेसे उनपर आक्रमण किया ॥ २ ॥
ततः श्वेतहयः कृष्णमब्रवीदजितं जयः ।
एष मां भ्रातृभिः सार्धं सुशर्माऽऽह्वयतेऽच्युत ॥ ३ ॥
तब श्वेतवाहन अर्जुनने अपराजित श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा, 'अच्युत! यह भाइयोंसहित सुशर्मा मुझे पुनः युद्धके लिये बुला रहा है ॥ ३ ॥
दीर्यते चोत्तरेणैव तत् सैन्यं मधुसूदन ।
द्वैधीभूतं मनो मेऽद्य कृतं संशप्तकैरिदम् ॥ ४ ॥
'उधर उत्तर दिशाकी ओर अपनी सेनाका नाश किया जा रहा है। मधुसूदन! इन संशप्तकोंने आज मेरे मनको दुविधामें डाल दिया है ॥ ४ ॥
किं नु संशप्तकान् हन्मि स्वान् रक्षाम्यहितार्दितान् ।
इति मे त्वं मतं वेत्सि तत्र किं सुकृतं भवेत् ॥ ५ ॥
'क्या मैं संशप्तकोंका वध करूँ अथवा शत्रुओंद्वारा पीड़ित हुए अपने सैनिकोंकी रक्षा करूँ। इस प्रकार मेरा मन संकल्प-विकल्पमें पड़ा है, सो आप जानते ही हैं। बताइये, अब मेरे लिये क्या करना अच्छा होगा' ॥ ५ ॥
एवमुक्तस्तु दाशार्हः स्यन्दनं प्रत्यवर्तयत् ।
येन त्रिगर्ताधिपतिः पाण्डवं समुपाह्वयत् ॥ ६ ॥
अर्जुनके ऐसा कहनेपर भगवान् श्रीकृष्णने अपने रथको उसी ओर लौटाया, जिस ओरसे त्रिगर्तराज सुशर्मा उन पाण्डुकुमारको युद्धके लिये ललकार रहा था ॥ ६ ॥
ततोऽर्जुनः सुशर्माणं विद्ध्वा सप्तभिराशुगैः । ध्वजं धनुश्चास्य तथा क्षुराभ्यां समकृन्तत ॥ ७ ॥ तत्पश्चात् अर्जुनने सुशर्माको सात बाणोंसे घायल करके दो क्षुरोंद्वारा उसके ध्वज और धनुषको काट डाला ॥ ७ ॥
त्रिगर्ताधिपतेश्चापि भ्रातरं षड्भिराशुगैः । साश्वं ससूतं त्वरितः पार्थः प्रैषीद् यमक्षयम् ॥ ८ ॥ साथ ही त्रिगर्तराजके भाईको भी छः बाण मारकर अर्जुनने उसे घोड़े और सारथिसहित तुरंत यमलोक भेज दिया ॥ ८ ॥
ततो भुजगसंकाशां सुशर्मा शक्तिमायसीम् । चिक्षेपार्जुनमादिश्य वासुदेवाय तोमरम् ॥ ९ ॥ तदनन्तर सुशर्माने सर्पके समान आकृतिवाली लोहेकी बनी हुई एक शक्तिको अर्जुनके ऊपर चलाया और वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णपर तोमरसे प्रहार किया ॥ ९ ॥
शक्तिं त्रिभिः शरैश्छित्त्वा तोमरं त्रिभिरर्जुनः । सुशर्माणं शरव्रातैर्मोहयित्वा न्यवर्तयत् ॥ १० ॥ अर्जुनने तीन बाणोंद्वारा शक्ति तथा तीन बाणोंद्वारा तोमरको काटकर सुशर्माको अपने बाणसमूहोंद्वारा मोहित करके पीछे लौटा दिया ॥ १० ॥
तं वासवमिवायान्तं भूरिवर्षं शरौघिनम् । राजंस्तावकसैन्यानां नोग्रं कश्चिदवारयत् ॥ ११ ॥ राजन्! इसके बाद वे इन्द्रके समान बाण-समूहोंकी भारी वर्षा करते हुए जब आपकी सेनापर आक्रमण करने लगे, उस समय आपके सैनिकोंमेंसे कोई भी उन उग्ररूपधारी अर्जुनको रोक न सका ॥ ११ ॥
ततो धनंजयो बाणैः सर्वानैव महारथान् । आयाद् विनिघ्नन् कौरव्यान् दहन् कक्षमिवानलः ॥ १२ ॥ तत्पश्चात् जैसे अग्नि घास-फूँसके समूहको जला डालती है, उसी प्रकार अर्जुन अपने बाणोंद्वारा समस्त कौरव महारथियोंको क्षत-विक्षत करते हुए वहाँ आ पहुँचे ॥ १२ ॥
तस्य वेगमसह्यं तं कुन्तीपुत्रस्य धीमतः । नाशक्नुवंस्ते संसोढुं स्पर्शमग्नेरिव प्रजाः ॥ १३ ॥ परम बुद्धिमान् कुन्तीपुत्रके उस असह्य वेगको कौरव-सैनिक उसी प्रकार नहीं सह सके, जैसे प्रजा अग्निका स्पर्श नहीं सहन कर पाती ॥ १३ ॥
संवेष्टयन्ननीकानि शरवर्षेण पाण्डवः । सुपर्णपातवद् राजन्नायात् प्राग्ज्योतिषं प्रति ॥ १४ ॥ राजन्! अर्जुनने बाणोंकी वर्षासे कौरव-सेनाओंको आच्छादित करते हुए गरुड़के समान वेगसे भगदत्तपर आक्रमण किया ॥ १४ ॥
यत् तदानामयज्जिष्णुर्भरतानामपापिनाम् । धनुः क्षेमकरं संख्ये द्विषतामश्रुवर्धनम् ।। १५ ।। तदेव तव पुत्रस्य राजन् दुर्द्यूतदेविनः । कृते क्षत्रविनाशाय धनुरायच्छदर्जुनः ।। १६ ।। महाराज! विजयी अर्जुनने युद्धमें शत्रुओंकी अश्रुधाराको बढ़ानेवाले जिस धनुषको कभी निष्पाप भरतवंशियोंका कल्याण करनेके लिये नवाया था, उसीको कपटद्यूत खेलनेवाले आपके पुत्रके अपराधके कारण सम्पूर्ण क्षत्रियोंका विनाश करनेके लिये हाथमें लिया ।। १५-१६ ।।
तथा विक्षोभ्यमाणा सा पार्थेन तव वाहिनी । व्यशीर्यत महाराज नौरिवासाद्य पर्वतम् ।। १७ ।। नरेश्वर! कुन्तीकुमार अर्जुनके द्वारा मथी जाती हुई आपकी वाहिनी उसी प्रकार छिन्न-भिन्न होकर बिखर गयी, जैसे नाव किसी पर्वतसे टकराकर टूक-टूक हो जाती है ।। १७ ।।
ततो दशसहस्राणि न्यवर्तन्त धनुष्मताम् । मतिं कृत्वा रणे क्रूरां वीरा जयपराजये ।। १८ ।। तदनन्तर दस हजार धनुर्धर वीर जय अथवा पराजयके हेतुभूत युद्धका क्रूरतापूर्ण निश्चय करके लौट आये ।। १८ ।।
व्यपेतहृदयत्रासा आवव्रुस्तं महारथाः । आर्च्छत् पार्थो गुरुं भारं सर्वभारसहो युधि ।। १९ ।। उन महारथियोंने अपने हृदयसे भयको निकालकर अर्जुनको वहाँ घेर लिया। युद्धमें समस्त भारोंको सहन करनेवाले अर्जुनने उनसे लड़नेका भारी भार भी अपने ही ऊपर ले लिया ।। १९ ।।
यथा नलवनं क्रुद्धः प्रभिन्नः षष्टिहायनः । मृद्नीयात् तद्वदायस्तः पार्थोऽमृद्नाच्चमूं तव ।। २० ।। जैसे साठ वर्षका मदस्रावी हाथी क्रोधमें भरकर नरकुलोंके जंगलको रौंदकर धूलमें मिला देता है, उसी प्रकार प्रयत्नशील पार्थने आपकी सेनाको मटियामेट कर दिया ।। २० ।।
तस्मिन् प्रमथिते सैन्ये भगदत्तो नराधिपः । तेन नागेन सहसा धनंजयमुपाद्रवत् ।। २१ ।। उस सेनाके मथ डाले जानेपर राजा भगदत्तने उसी सुप्रतीक हाथीके द्वारा सहसा धनंजयपर धावा किया ।।
तं रथेन नरव्याघ्रः प्रत्यगृह्णाद् धनंजयः । स संनिपातस्तुमुलो बभूव रथनागयोः ।। २२ ।।
नरश्रेष्ठ अर्जुनने रथके द्वारा ही उस हाथीका सामना किया। रथ और हाथीका वह संघर्ष बड़ा भयंकर था ।। कल्पिताभ्यां यथाशास्त्रं रथेन च गजेन च । संग्रामे चेरतुर्वीरौ भगदत्तधनंजयौ ॥ २३ ॥ शास्त्रीय विधिके अनुसार निर्मित और सुसज्जित रथ तथा सुशिक्षित हाथीके द्वारा वीरवर अर्जुन और भगदत्त संग्रामभूमिमें विचरने लगे ।। २३ ।। ततो जीमूतसंकाशान्नागादिन्द्र इव प्रभुः । अभ्यवर्षच्छरौघेण भगदत्तो धनंजयम् ॥ २४ ॥ तदनन्तर इन्द्रके समान शक्तिशाली राजा भगदत्त अर्जुनपर मेघ-सदृश हाथीसे बाणसमूहरूपी जलराशिकी वर्षा करने लगे ।। २४ ।। स चापि शरवर्षं तं शरवर्षेण वासविः । अप्राप्तमेव चिच्छेद भगदत्तस्य वीर्यवान् ॥ २५ ॥ इधर पराक्रमी इन्द्रकुमार अर्जुनने अपने बाणोंकी वृष्टिसे भगदत्तकी बाण-वर्षाको अपने पासतक पहुँचनेके पहले ही छिन्न-भिन्न कर दिया ।। २५ ।। ततः प्राग्ज्योतिषो राजा शरवर्षं निवार्य तत् । शरैरर्जघ्ने महाबाहुं पार्थं कृष्णं च मारिष ॥ २६ ॥ आर्य! तदनन्तर प्राग्ज्योतिषनरेश राजा भगदत्तने भी विपक्षीकी उस बाण-वर्षाका निवारण करके महाबाहु अर्जुन और श्रीकृष्णको अपने बाणोंसे घायल कर दिया ।। ततस्तु शरजालेन महताभ्यवकीर्य तौ । चोदयामास तं नागं वधायाच्युतपार्थयोः ॥ २७ ॥ फिर उनके ऊपर बाणोंका महान् जाल-सा बिछाकर श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनोंके वधके लिये उस गजराजको आगे बढ़ाया ।। २७ ।। तमापतन्तं द्विरदं दृष्ट्वा क्रुद्धमिवान्तकम् । चक्रेऽपसव्यं त्वरितः स्यन्दनेन जनार्दनः ॥ २८ ॥ क्रोधमें भरे हुए यमराजके समान उस हाथीको आक्रमण करते देख भगवान् श्रीकृष्णने तुरंत ही रथद्वारा उसे अपने दाहिने कर दिया ।। २८ ।। तं प्राप्तमपि नैयेष परावृत्तं महाद्विपम् । सारोहं मृत्युसात्कर्तुं स्मरन् धर्मं धनंजयः ॥ २९ ॥ यद्यपि वह महान् गजराज आक्रमण करते समय अपने बहुत निकट आ गया था, तो भी अर्जुनने धर्मका स्मरण करके सवारोंसहित उस हाथीको मृत्युके अधीन करनेकी इच्छा नहीं की* ।। २९ ।। स तु नागो द्विपारथान् हयांश्चामृद्य मारिष । प्राहिणोन्मृत्युलोकाय ततः क्रुद्धो धनंजयः ॥ ३० ॥
आदरणीय महाराज! उस हाथीने बहुत-से हाथियों, रथों और घोड़ोंको कुचलकर यमलोक भेज दिया। यह देख अर्जुनको बड़ा क्रोध हुआ ।। ३० ।।
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि संशप्तकवधपर्वणि भगदत्तयुद्धे अष्टाविंशोऽध्यायः ।। २८ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत संशप्तकवधपर्वमें भगदत्तका युद्धविषयक अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २८ ।।
* भगदत्तके हाथीने जब आक्रमण किया, उस समय श्रीकृष्ण रथको बगलमें हटाकर उसके आघातसे बच गये। अर्जुनने हाथीके सवारोंको सचेत नहीं किया था; उस दशामें हाथीको मारना युद्धके लिये स्वीकृत नियमके विरुद्ध होता। उसमें नियम था—'समाभाष्य प्रहर्तव्यम्'—'विपक्षीको सावधान करके उसके ऊपर प्रहार करना चाहिये।' इसीलिये अर्जुनने धर्मका विचार करके उसे उस समय नहीं मारा।
एकोनत्रिंशोऽध्यायः
अर्जुन और भगदत्तका युद्ध, श्रीकृष्णद्वारा भगदत्तके वैष्णवास्त्रसे अर्जुनकी रक्षा तथा अर्जुनद्वारा हाथीसहित भगदत्तका वध
धृतराष्ट्र उवाच
तथा क्रुद्धः किमकरोद् भगदत्तस्य पाण्डवः ।
प्राग्ज्योतिषो वा पार्थस्य तन्मे शंस यथातथम् ॥ १ ॥
धृतराष्ट्रने पूछा— संजय! उस समय क्रोधमें भरे हुए पाण्डुकुमार अर्जुनने भगदत्तका और भगदत्तने अर्जुनका क्या किया? यह मुझे ठीक-ठीक बताओ ॥ १ ॥
संजय उवाच
प्राग्ज्योतिषेण संसक्तावुभौ दाशार्हपाण्डवौ ।
मृत्युदंष्ट्रान्तिकं प्राप्तौ सर्वभूतानि मेनिरे ॥ २ ॥
संजयने कहा— राजन्! भगदत्तसे युद्धमें उलझे हुए श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनोंको समस्त प्राणियोंने मौतकी दाढ़ोंमें पहुँचा हुआ ही माना ॥ २ ॥
तथा तु शरवर्षाणि पातयत्यनिशं प्रभो ।
गजस्कन्धान्महाराज कृष्णयोः स्यन्दनस्थयोः ॥ ३ ॥
शक्तिशाली महाराज! हाथीकी पीठसे भगदत्त रथपर बैठे हुए श्रीकृष्ण और अर्जुनपर निरन्तर बाणोंकी वर्षा कर रहे थे ॥ ३ ॥
अथ कार्ष्णायसैर्बाणैः पूर्णकार्मुकनिःसृतैः ।
अविध्यद् देवकीपुत्रं हेमपुङ्खैः शिलाशितैः ॥ ४ ॥
उन्होंने धनुषको पूर्णरूपसे खींचकर छोड़े हुए लोहेके बने और शानपर चढ़ाकर तेज किये हुए सुवर्णमय पंखयुक्त बाणोंसे देवकीपुत्र श्रीकृष्णको घायल कर दिया ॥ ४ ॥
अग्निस्पर्शसमास्तीक्ष्णा भगदत्तेन चोदिताः ।
निर्भिद्य देवकीपुत्रं क्षितिं जग्मुः सुवाससः ॥ ५ ॥
भगदत्तके चलाये हुए अग्निके स्पर्शके समान तीक्ष्ण और सुन्दर पंखवाले बाण देवकीपुत्र श्रीकृष्णके शरीरको छेदकर धरतीमें समा गये ॥ ५ ॥
तस्य पार्थो धनुश्छित्त्वा परिवारं निहत्य च ।
लालयन्निव राजानं भगदत्तमयोधयत् ॥ ६ ॥
तब अर्जुनने राजा भगदत्तका धनुष काटकर उनके परिवारको मार डाला और उन्हें लाड़ लड़ाते हुए-से उनके साथ युद्ध आरम्भ किया ॥ ६ ॥
सोऽर्करश्मिनिभांस्तीक्ष्णांस्तोमरान् वै चतुर्दश । अप्रेषयत् सव्यसाची द्विधैककमथाच्छिनत् ॥ ७ ॥ भगदत्तने सूर्यकी किरणोंके समान तीखे चौदह तोमर चलाये, परंतु सव्यसाची अर्जुनने उनमेंसे प्रत्येकके दो-दो टुकड़े कर डाले ॥ ७ ॥
ततो नागस्य तद् वर्म व्यधमत् पाकशासनिः । शरजालेन महता तद् व्यशीर्यत भूतले ॥ ८ ॥ तब इन्द्रकुमारने भारी बाण-वर्षाके द्वारा उस हाथीके कवचको काट डाला, जिससे कवच जीर्ण-शीर्ण होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ८ ॥
शीर्णवर्मा स तु गजः शरैः सुभृशमर्दितः । बभौ धारानिपाताक्तो व्यभ्रः पर्वतराडिव ॥ ९ ॥ कवच कट जानेपर हाथीको बाणोंके आघातसे बड़ी पीड़ा होने लगी। वह खूनकी धारासे नहा उठा और बादलोंसे रहित एवं (गैरिकमिश्रित) जलधारासे भीगे हुए गिरिराजके समान शोभा पाने लगा ॥ ९ ॥
ततः प्राग्ज्योतिषः शक्तिं हेमदण्डामयस्मयीम् । व्यसृजद् वासुदेवाय द्विधा तामर्जुनोऽच्छिनत् ॥ १० ॥ तब भगदत्तने वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णको लक्ष्य करके सुवर्णमय दण्डसे युक्त लोहमयी शक्ति चलायी। परंतु अर्जुनने उसके दो टुकड़े कर डाले ॥ १० ॥
ततश्छत्रं ध्वजं चैव छित्त्वा राज्ञोऽर्जुनः शरैः । विव्याध दशभिस्तूर्णमुत्स्मयन् पर्वतेश्वरम् ॥ ११ ॥ तदनन्तर अर्जुनने अपने बाणोंद्वारा राजा भगदत्तके छत्र और ध्वजको काटकर मुसकराते हुए दस बाणोंद्वारा तुरंत ही उन पर्वतेश्वरको बींध डाला ॥ ११ ॥
सोऽतिविद्धोऽर्जुनशरैः सुपुङ्खैः कङ्कपत्रिभिः । भगदत्तस्ततः क्रुद्धः पाण्डवस्य जनाधिपः ॥ १२ ॥ अर्जुनके कंकपत्रयुक्त सुन्दर पाँखोंवाले बाणोंद्वारा अत्यन्त घायल हो राजा भगदत्त उन पाण्डुपुत्रपर कुपित हो उठे ॥ १२ ॥
व्यसृजत् तोमरान् मूर्ध्नि श्वेताश्वस्योन्ननाद च । तैरर्जुनस्य समरे किरीटं परिवर्तितम् ॥ १३ ॥ उन्होंने श्वेतवाहन अर्जुनके मस्तकपर तोमरोंका प्रहार किया और जोरसे गर्जना की। उन तोमरोंने समरभूमिमें अर्जुनके किरीटको उलट दिया ॥ १३ ॥
परिवृत्तं किरीटं तद् यमयन्नेव पाण्डवः । सुदृष्टः क्रियतां लोक इति राजानमब्रवीत् ॥ १४ ॥ उलटे हुए किरीटको ठीक करते हुए पाण्डुपुत्र अर्जुनने भगदत्तसे कहा—'राजन्! अब इस संसारको अच्छी तरह देख लो' ॥ १४ ॥
एवमुक्तस्तु संक्रुद्धः शरवर्षेण पाण्डवम् ।
अभ्यवर्षत् सगोविन्दं धनुरादाय भास्वरम् ॥ १५ ॥
अर्जुनके ऐसा कहनेपर भगदत्तने अत्यन्त कुपित हो एक तेजस्वी धनुष हाथमें लेकर श्रीकृष्णसहित अर्जुनपर बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी ।। १५ ।।
तस्य पार्थो धनुश्छित्त्वा तूणीरान् संनिकृत्य च ।
त्वरमाणो द्विसप्तत्या सर्वमर्मस्वताडयत् ॥ १६ ॥
अर्जुनने उनके धनुषको काटकर उनके तूणीरोंके भी टुकड़े-टुकड़े कर दिये। फिर तुरंत ही बहत्तर बाणोंसे उनके सम्पूर्ण मर्मस्थानोंमें गहरी चोट पहुँचायी ।।
विद्धस्ततोऽतिव्यथितो वैष्णवास्त्रमुदीरयन् ।
अभिमन्त्र्याङ्कुशं क्रुद्धो व्यसृजत् पाण्डवोरसि ॥ १७ ॥
उन बाणोंसे घायल हो अत्यन्त पीड़ित होकर भगदत्तने वैष्णवास्त्र प्रकट किया। उसने कुपित हो अपने अंकुशको ही वैष्णवास्त्रसे अभिमन्त्रित करके पाण्डुनन्दन अर्जुनकी छाती पर छोड़ दिया ।। १७ ।।
विसृष्टं भगदत्तेन तदस्त्रं सर्वघाति वै ।
उरसा प्रतिजग्राह पार्थं संच्छाद्य केशवः ॥ १८ ॥
भगदत्तका छोड़ा हुआ वह अस्त्र सबका विनाश करनेवाला था। भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनको ओटमें करके स्वयं ही अपनी छातीपर उसकी चोट सह ली ।। १८ ।।
वैजयन्त्यभवन्माला तदस्त्रं केशवोरसि ।
पद्मकोशविचित्राढ्या सर्वर्तुकुसुमोत्कटा ॥ १९ ॥
ज्वलनार्केन्दुवर्णाभा पावकोज्ज्वलपल्लवा ।
तया पद्मपलाशिन्या वातकम्पितपत्रया ॥ २० ॥
शुशुभेऽभ्यधिकं शौरिरतसीपुष्पसंनिभः ।
(केशवः केशिमथनः शार्ङ्गधन्वारिमर्दनः ।
संध्याभ्रैरिव संछन्नः प्रावृट्काले नगोत्तमः ॥)
भगवान् श्रीकृष्णकी छातीपर आकर वह अस्त्र वैजयन्ती मालाके रूपमें परिणत हो गया। वह माला कमलकोशकी विचित्र शोभासे युक्त तथा सभी ऋतुओंके पुष्पोंसे सम्पन्न थी। उससे अग्नि, सूर्य और चन्द्रमाके समान प्रभा फैल रही थी। उसका एक-एक दल अग्निके समान प्रकाशित हो रहा था। कमलदलोंसे सुशोभित तथा हवासे हिलते हुए दलोंवाली उस वैजयन्ती मालासे तीसीके फूलोंके समान श्यामवर्णवाले केशिहन्ता, शूरसेननन्दन, शार्ङ्गधन्वा, शत्रुसूदन भगवान् केशव अधिकाधिक शोभा पाने लगे, मानो वर्षाकालमें संध्याके मेघोंसे आच्छादित श्रेष्ठ पर्वत सुशोभित हो रहा हो ॥ १९-२० १/२ ॥
ततोऽर्जुनः क्लान्तमनाः केशवं प्रत्यभाषत ॥ २१ ॥
अयुध्यमानस्तुरगान् संयन्तास्मीति चानघ ।
इत्युक्त्वा पुण्डरीकाक्ष प्रतिज्ञां स्वां न रक्षसि ॥ २२ ॥
यद्यहं व्यसनी वा स्यामशक्तो वा निवारणे ।
ततस्त्वयैवं कार्यं स्यान्न तत्कार्यं मयि स्थिते ॥ २३ ॥
उस समय अर्जुनके मनमें बड़ा क्लेश हुआ। उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा—'अनघ! आपने तो प्रतिज्ञा की है कि मैं युद्ध न करके घोड़ोंको काबूमें रखूँगा—केवल सारथिका काम करूँगा; किंतु कमलनयन! आप वैसी बात कहकर भी अपनी प्रतिज्ञाका पालन नहीं कर रहे हैं। यदि मैं संकटमें पड़ जाता अथवा अस्त्रका निवारण करनेमें असमर्थ हो जाता तो उस समय आपका ऐसा करना उचित होता। जब मैं युद्धके लिये तैयार खड़ा हूँ, तब आपको ऐसा नहीं करना चाहिये ॥ २१—२३ ॥
सबाणः सधनुश्चाहं ससुरासुरमानुषान् ।
शक्तो लोकानिमाञ्जेतुं तच्चापि विदितं तव ॥ २४ ॥
'आपको तो यह भी विदित है कि यदि मेरे हाथमें धनुष और बाण हो तो मैं देवता, असुर और मनुष्योंसहित इन सम्पूर्ण लोकोंपर विजय पा सकता हूँ' ॥ २४ ॥
ततोऽर्जुनं वासुदेवः प्रत्युवाचार्थवद् वचः ।
शृणु गुह्यमिदं पार्थ पुरा वृत्तं यथानघ ॥ २५ ॥
तब वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनसे ये रहस्यपूर्ण वचन कहे—'अनघ! कुन्तीनन्दन! इस विषयमें यह गोपनीय रहस्यकी बात सुनो, जो पूर्वकालमें घटित हो चुकी है ॥ २५ ॥
चतुर्मूर्तिरहं शश्वल्लोकत्राणार्थमुद्यतः ।
आत्मानं प्रविभज्येह लोकानां हितमादधे ॥ २६ ॥
‘मैं चार स्वरूप धारण करके सदा सम्पूर्ण लोकोंकी रक्षाके लिये उद्यत रहता हूँ। अपनेको ही यहाँ अनेक रूपोंमें विभक्त करके समस्त संसारका हित-साधन करता हूँ॥ २६ ॥
एका मूर्तिस्तपश्चर्यां कुरुते मे भुवि स्थिता ।
अपरा पश्यति जगत् कुर्वाणं साध्वसाधुनी ॥ २७ ॥
‘मेरी एक मूर्ति इस भूमण्डलपर (बदरिकाश्रममें नर-नारायणके रूपमें) स्थित हो तपश्चर्या करती है। दूसरी (परमात्मस्वरूपा) मूर्ति शुभाशुभकर्म करनेवाले जगत्को साक्षीरूपसे देखती रहती है॥ २७ ॥
अपरा कुरुते कर्म मानुषं लोकमाश्रिता ।
शेते चतुर्थी त्वपरा निद्रां वर्षसहस्रिकम् ॥ २८ ॥
‘तीसरी मूर्ति (मैं स्वयं जो) मनुष्यलोकका आश्रय ले नाना प्रकारके कर्म करती है और चौथी मूर्ति वह है, जो सहस्र युगोंतक एकार्णवके जलमें शयन करती है॥ २८ ॥
यासौ वर्षसहस्रान्ते मूर्तिरुत्तिष्ठते मम ।
वरार्हेभ्यो वरान् श्रेष्ठांस्तस्मिन् काले ददाति सा ॥ २९ ॥
‘सहस्रयुगके पश्चात् मेरा वह चौथा स्वरूप जब योगनिद्रासे उठता है, उस समय वर पानेके योग्य श्रेष्ठ भक्तोंको उत्तम वर प्रदान करता है॥ २९ ॥
तं तु कालमनुप्राप्तं विदित्वा पृथिवी तदा ।
अयाचत वरं यन्मां नरकार्थाय तच्छृणु ॥ ३० ॥
‘एक बार जब कि वही समय प्राप्त था, पृथिवीदेवीने अपने पुत्र नरकासुरके लिये मुझसे जो वर माँगा, उसे सुनो॥ ३० ॥
देवानां दानवानां च अवध्यस्तनयोऽस्तु मे ।
उपेतो वैष्णवास्त्रेण तन्मे त्वं दातुमर्हसि ॥ ३१ ॥
‘मेरा पुत्र वैष्णवास्त्रसे सम्पन्न होकर देवताओं और दानवोंके लिये अवध्य हो जाय, इसलिये आप कृपापूर्वक मुझे वह अपना अस्त्र प्रदान करें’ ॥ ३१ ॥
एवं वरमहं श्रुत्वा जगत्यास्तनये तदा ।
अमोघमस्त्रं प्रायच्छं वैष्णवं परमं पुरा ॥ ३२ ॥
‘उस समय पृथिवीके मुँहसे अपने पुत्रके लिये इस प्रकार याचना सुनकर मैंने पूर्वकालमें अपना परम उत्तम अमोघ वैष्णव-अस्त्र उसे दे दिया॥ ३२ ॥
अवोचं चैतदस्त्रं वै ह्यमोघं भवतु क्षमे ।
नरकस्याभिरक्षार्थं नैनं कश्चिद् वधिष्यति ॥ ३३ ॥
‘उसे देते समय मैंने कहा—‘वसुधे! यह अमोघ वैष्णवास्त्र नरकासुरकी रक्षाके लिये उसके पास रहे। फिर उसे कोई भी नष्ट नहीं कर सकेगा॥ ३३॥ अनेनास्त्रेण ते गुप्तः सुतः परबलार्दनः । भविष्यति दुराधर्षः सर्वलोकेषु सर्वदा ॥ ३४ ॥ ‘इस अस्त्रसे सुरक्षित रहकर तुम्हारा पुत्र शत्रुओंकी सेनाको पीड़ित करनेवाला और सदा सम्पूर्ण लोकोंमें दुर्धर्ष बना रहेगा’॥ ३४॥ तथेत्युक्त्वा गता देवी कृतकामा मनस्विनी । स चाप्यासीद् दुराधर्षो नरकः शत्रुतापनः ॥ ३५ ॥ ‘तब ‘जो आज्ञा’ कहकर मनस्विनी पृथ्वीदेवी कृतार्थ होकर चली गयी। वह नरकासुर भी (उस अस्त्रको पाकर) शत्रुओंको संताप देनेवाला तथा अत्यन्त दुर्जय हो गया॥ ३५॥ तस्मात् प्राग्ज्योतिषं प्राप्तं तदस्त्रं पार्थ मामकम् । नास्यावध्योऽस्ति लोकेषु सेन्द्ररुद्रेषु मारिष ॥ ३६ ॥ ‘पार्थ! नरकासुरसे वह मेरा अस्त्र इस प्राग्ज्योतिषनरेश भगदत्तको प्राप्त हुआ। आर्य! इन्द्र तथा रुद्रसहित तीनों लोकोंमें कोई भी ऐसा वीर नहीं है, जो इस अस्त्रके लिये अवध्य हो॥ ३६॥ तन्मया त्वत्कृते चैतदन्यथा व्यपनामितम् । विमुक्तं परमास्त्रेण जहि पार्थ महासुरम् ॥ ३७ ॥ ‘अतः मैंने तुम्हारी रक्षाके लिये उस अस्त्रको दूसरे प्रकारसे उसके पाससे हटा दिया है। पार्थ! अब वह महान् असुर उस उत्कृष्ट अस्त्रसे वंचित हो गया है। अतः तुम उसे मार डालो॥ ३७॥ वैरिणं जहि दुर्धर्षं भगदत्तं सुरद्विषम् । यथाहं जघ्निवान् पूर्वं हितार्थं नरकं तथा ॥ ३८ ॥ ‘दुर्जय वीर भगदत्त तुम्हारा वैरी और देवताओंका द्रोही है। अतः तुम उसका वध कर डालो; जैसे कि मैंने पूर्वकालमें लोकहितके लिये नरकासुरका संहार किया था’॥ ३८॥ एवमुक्तस्तदा पार्थः केशवेन महात्मना । भगदत्तं शितैर्बाणैः सहसा समवाकिरत् ॥ ३९ ॥ महात्मा केशवके ऐसा कहनेपर कुन्तीकुमार अर्जुन उसी समय भगदत्तपर सहसा पैने बाणोंकी वर्षा करने लगे॥ ३९॥ ततः पार्थो महाबाहुरसम्भ्रान्तो महामनाः । कुम्भयोरन्तरे नागं नाराचेन समर्पयत् ॥ ४० ॥ तत्पश्चात् महाबाहु महामना पार्थने बिना किसी घबराहटके हाथीके कुम्भस्थलमें एक नाराचका प्रहार किया॥ ४०॥ स समासाद्य तं नागं बाणो वज्र इवाचलम् ।