महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 232, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंराजन्! युयुत्सु बड़ी उतावलीके साथ रथसे उतरकर दूर चले गये थे। तत्पश्चात् पाण्डव-योद्धा उस गजराजको शीघ्रतापूर्वक मार डालनेकी इच्छासे भैरव-गर्जना करते हुए अपने बाणोंकी वर्षाद्वारा उसे सींचने लगे ॥ ५७ १/२ ॥
पुत्रस्तु तव सम्भ्रान्तः सौभद्रस्याप्लुतो रथम् ॥ ५८ ॥
स कुञ्जरस्थो विसृजन्निक्षूनरिषु पार्थिवः ।
बभौ रश्मीनिवादित्यो भुवनेषु समुत्सृजन् ॥ ५९ ॥
उस समय घबराये हुए आपके पुत्र युयुत्सु अभिमन्युके रथपर जा बैठे। हाथीकी पीठपर बैठे हुए राजा भगदत्त शत्रुओंपर बाण-वर्षा करते हुए सम्पूर्ण लोकोंमें अपनी किरणोंका विस्तार करनेवाले सूर्यके समान शोभा पा रहे थे ॥ ५८-५९ ॥
तमार्जुनिर्द्वादशभिर्युयुत्सुर्दशभिः शरैः ।
त्रिभिस्त्रिभिर्द्रौपदेया धृष्टकेतुश्च विव्यधुः ॥ ६० ॥
अर्जुनकुमार अभिमन्युने बारह, युयुत्सुने दस और द्रौपदीके पुत्रों तथा धृष्टकेतुने तीन-तीन बाणोंसे भगदत्तके उस हाथीको घायल कर दिया ॥ ६० ॥
सोऽतियत्नार्पितैर्बाणैराचितो द्विरदो बभौ ।
संस्यूत इव सूर्यस्य रश्मिभिर्जलदो महान् ॥ ६१ ॥
अत्यन्त प्रयत्नपूर्वक चलाये हुए उन बाणोंसे हाथीका सारा शरीर व्याप्त हो रहा था। उस अवस्थामें वह सूर्यकी किरणोंमें पिरोये हुए महामेघके समान शोभा पा रहा था ॥ ६१ ॥
नियन्तुः शिल्पयत्नाभ्यां प्रेरितोऽरिशरार्दितः ।
परिचिक्षेप तान् नागः स रिपून् सव्यदक्षिणम् ॥ ६२ ॥
महावतके कौशल और प्रयत्नसे प्रेरित होकर वह हाथी शत्रुओंके बाणोंसे पीड़ित होनेपर भी उन विपक्षियोंको दायें-बायें उठाकर फेंकने लगा ॥ ६२ ॥
गोपाल इव दण्डेन यथा पशुगणान् वने ।
आवेष्टयत तां सेनां भगदत्तस्तथा मुहुः ॥ ६३ ॥
जैसे ग्वाला जंगलमें पशुओंको डंडेसे हाँकता है, उसी प्रकार भगदत्तने पाण्डव-सेनाको बार-बार घेर लिया ॥ ६३ ॥
क्षिप्रं श्येनाभिपन्नानां वायसानामिव स्वनः ।
बभूव पाण्डवेयानां भृशं विद्रवतां स्वनः ॥ ६४ ॥
जैसे बाज पक्षीके चंगुलमें फँसे हुए अथवा उसके आक्रमणसे त्रस्त हुए कौओंमें शीघ्र ही काँव-काँवका कोलाहल होने लगता है, उसी प्रकार भागते हुए पाण्डव योद्धाओंका आर्तनाद जोर-जोरसे सुनायी दे रहा था ॥ ६४ ॥
स नागराजः प्रवराङ्कुशाहतः
पुरा सपक्षोऽद्रिवरो यथा नृप ।