महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 233, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंभयं तदा रिपुषु समादधद् भृशं वणिग्जनानां क्षुभितो यथार्णवः ॥ ६५ ॥ नरेश्वर! उस समय विशाल अंकुशकी मार खाकर वह गजराज पूर्वकालके पंखधारी श्रेष्ठ पर्वतकी भाँति शत्रुओंको उसी प्रकार अत्यन्त भयभीत करने लगा, जैसे विक्षुब्ध महासागर व्यापारियोंको भयमें डाल देता है ॥ ६५ ॥
ततो ध्वनिर्दिरदरथाश्वपार्थिवै- र्भयाद् द्रवद्भिर्जनितोऽतिभैरवः । क्षितिं वियद् द्यां विदिशो दिशस्तथा समावृणोत् पार्थिव संयुगे ततः ॥ ६६ ॥ महाराज! तदनन्तर भयसे भागते हुए हाथी, रथ, घोड़े तथा राजाओंने वहाँ अत्यन्त भयंकर आर्तनाद फैला दिया। उनके उस भयंकर शब्दने युद्धस्थलमें पृथ्वी, आकाश, स्वर्ग तथा दिशा-विदिशाओंको सब ओरसे आच्छादित कर दिया ॥ ६६ ॥
स तेन नागप्रवरेण पार्थिवो भृशं जगाहे द्विषतामनीकिनीम् । पुरा सुगुप्तां विबुधैरिवाहवे विरोचनो देववरूथिनीमिव ॥ ६७ ॥ उस गजराजके द्वारा राजा भगदत्तने शत्रुओंकी सेनामें अच्छी तरह प्रवेश किया। जैसे पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके समय देवताओंद्वारा सुरक्षित देव-सेनामें विरोचनने प्रवेश किया था ॥ ६७ ॥
भृशं ववौ ज्वलनसखो वियद् रजः समावृणोन्मुहुरपि चैव सैनिकान् । तमेकनागं गणशो यथा गजान् समन्ततो द्रुतमथ मेनिरे जनाः ॥ ६८ ॥ उस समय वहाँ बड़े जोरसे वायु चलने लगी। आकाशमें धूल छा गयी। उस धूलने समस्त सैनिकोंको ढक दिया। उस समय सब लोग चारों ओर दौड़ लगानेवाले उस एकमात्र हाथीको हाथियोंके झुंड-सा मानने लगे ॥ ६८ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि संशप्तकवधपर्वणि भगदत्तयुद्धे षड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत संशप्तकवधपर्वमें भगदत्तका युद्धविषयक छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६ ॥